शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

यह कैसा सिस्टम है

वर्षों पूर्व इलाहाबाद के एक उत्साही युवा वैज्ञानिक अजय सोनकर ने अपने अथक प्रयासों से कृत्रिम मोती विकसित करने में सफलता पायी थी. तब तक यह धारणा आम थी कि सीपियों के माध्यम से उत्पन्न होने वाला यह कृत्रिम मोती खारे पानी में बेहतर ढंग से विकसित होता है. सोनकर ने अपना प्रयोग मीठे पानी में किया और वह कामयाब रहे. उनकी इस कामयाबी के चर्चे स्थानीय मीडिया में शुरू होते ही कृत्रिम मोती के उत्पादन से जुड़ी अमेरिकी और जापानी कंपनियों ने उनसे संपर्क साधने में ज़रा भी देर नहीं लगाई और इस तरह उनके पास साथ साथ काम करने के प्रस्तावों की झड़ी लग गयी.
उसी दौरान उत्तरप्रदेश की तत्कालीन मायावती सरकार के कैबिनेट मंत्री आरके चौधरी इलाहाबाद तशरीफ़ लाये तो उन्हें इस बारे में जानकारी दी गयी. अच्छा हुआ कि श्री चौधरी ने तब सोनकर की मामा भांजा तालाब स्थित प्रयोगशाला का दौरा किया और हर तरह की मदद के लिए लखनऊ आने का निमंत्रण दिया. बहरहाल...यहाँ मुद्दा यह नहीं कि सोनकर उनके प्रस्ताव पर लखनऊ गए या नहीं. मुद्दा यह है कि सोनकर की जिस उपलब्धि की जानकारी विदेशी एजेंसियों को पहले हो गयी, वह राज्य सरकार को तब तक पता नहीं थी, जब तक चौधरी को वहां ले नहीं जाया गया. हालांकि, उसके बाद भी राज्य सरकार की तरफ से एक होनहार वैज्ञानिक को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया. सोनकर ने अपने संसाधनों के बल पर तरह तरह के रंगीन और डिजाइनर मोतियों का उत्पादन करने में सफलता पायी, जो बाद में खूब शोहरत हासिल करते रहे...
खैर...यह प्रकरण इसलिए याद आया क्योंकि हाल ही में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जो बताती हैं कि हमारी व्यवस्था के नियामक तब तक कुछ जान समझ नहीं पाते जब तक कि मीडिया में उनके चर्चे आम न हो जाएं. इन्हीं में से एक घटना है लुधियाना में आयोजित हुई 68वीं नेशनल साइकिलिंग चैम्पियनशिप प्रतियोगिता की. इस प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए लुधियाना पहुंचे यूपी साइकिलिंग एसोसिएशन के 21 बच्चे महज एक साइकिल से अभ्यास करने को बाध्य होते दिखे. यह मसला जब मीडिया की सुर्ख़ियों में आया तब कहीं जाकर सत्ता प्रतिष्ठान इसकी जानकारी हो पायी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इन युवकों को साइकिल उपलब्ध कराने का आदेश दिया. अखिल भारतीय स्तर की इस प्रतियोगिता में भागीदारी के लिए पहुंचे इन बच्चों का उत्साह काबिलेतारीफ रहा, लेकिन हमारे बच्चे साइकिल तक के लिए तरसें, यह जानकर कोफ़्त होती है. बेशक, प्रतियोगिता में शामिल बच्चे किसी सरकारी संगठन के माध्यम से वहां नहीं गए थे. फिरभी, यह तो कहा ही जा सकता है कि सरकारी अमले को इसकी जानकारी होनी ही चाहिए थी.
एक अन्य घटना सचिवालय में हुई. मुख्यमंत्री तथा अन्य महत्वपूर्ण लोगों के लिए आरक्षित लिफ्ट हाल ही में ऐसी बिगड़ी कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिम्पल यादव लगभग आधा घंटा तक उसी में फंसे रहे. जैसे तैसे मुख्यमंत्री को सकुशल निकाला तो गया लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल भी छोड़ दिया. क्या व्यवस्था संभालने वालों को समय रहते कुछ भी पता नहीं होता. सवाल यह है कि आखिर लिफ्ट को त्रुटि मुक्त क्यों नहीं रखा जा सका. जब हमारे महत्वपूर्ण लोगों के लिए की गयी व्यवस्था इस तरह जर्जर होगी तो सामान्य आदमी की सुविधाओं का क्या हाल होगा, कल्पना ही की जा सकती है. इस सम्बन्ध में सिर्फ दो ही वजहें हो सकती हैं- या तो व्यवस्था संभाल रहे लोगों को कुछ पता ही नहीं या फिर उन्हें अपने दायित्वों को पूरा करने में कोई रूचि नहीं. साफ़ है- हमारा सिस्टम आज भी महज ऊंघने वालों के हाथों में गिरवी है, कहने को कुछ भी कहते रहा जाए.
दरअसल हमारी व्यवस्था आज भी कुछ यूं चल रही है जहां लोगों को बताने के लिए तो बहुत कुछ होता है, लेकिन जानने में किसी की दिलचस्पी नहीं. कहीं होहल्ला न हो तो सिस्टम के लोग कभी भी जनता जनार्दन का हाल जानने का कष्ट न करें. अब देखिये न- नौकरशाही को साफ़ निर्देश हैं कि गाँवों का दौरा करके वहां के हालात को बारीकी से देखा जाए और यह भी पता लगाया जाए कि विकास योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति क्या है, लेकिन कितने अफसरों ने इस सम्बन्ध में रूचि ली, यह भी क्या बताने की जरूरत है. शायद यही वजह है कि अच्छी से अच्छी विकास योजनाएं धरातल पर दम तोड़ देती हैं और सत्ता प्रतिष्ठान को उसकी पूरी खबर तक नहीं होती.
सच तो यह है कि आज भी हमारे सरकारी महकमों को जनता की आवश्यकताओं की पर्याप्त जानकारी नहीं है. ज़रा नमूने देखें- सिंचाई विभाग के अधिकतर दफ्तर शहरों में स्थापित हैं. लगभग सारे अभियंता शहरों में ही निवास कर रहे हैं. आसानी से समझा जा सकता  है कि इन्हें किसानों की सिंचाई सम्बन्धी समस्याओं की कितनी जानकारी होगी. परिणाम- जब खेतों को पानी की जरूरत होती है तो नहरें अक्सर सूखी रहती हैं और जब जरूरत नहीं होती है तो नहरों में पानी उतराता रहता है. अब ऐसे में किसानों का कितना भला होगा, आसानी से समझा जा सकता है. इलाहाबाद में यमुनापार स्थित एक किसान रामायण प्रसाद पाठक कहते हैं, ‘हमारे सिस्टम को किसानों की जरूरतों की सम्पूर्ण जानकारी है ही नहीं. पानी तब मिलता है, जब इसकी जरूरत ही नहीं होती. ढिंढोरा महज इस बात का पीटा जाता है कि सरकार ने सिंचाई मुफ्त कर दी है. आदर्श स्थिति तो यह होती कि सिंचाई के लिए बारहों महीने पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती और गर्मियों में भी किसान कुछ न कुछ फसल उगाते. ऐसा होता तो किसानों को सिंचाई का पैसा देने में कोई एतराज नहीं होता.’
इसी तरह बिजली आपूर्ति, ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े तमाम कर्मी गाँवों में जाकर वास्तविक आवश्यकताओं को जानने समझने की जहमत नहीं उठाते. ऐसे में कैसे माना जाए कि सिस्टम को वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी होगी. शहरों में कोई मध्यम या गरीब तबके का व्यक्ति अपना मकान बनवाने लगे तो सम्बंधित प्राधिकरण का कर्मचारी फ़ौरन वहां पहुँच जाएगा और तरह तरह के क़ानून बताकर निर्माण में व्यवधान डालेगा, लेकिन बड़े बड़े बिल्डर धड़ल्ले से बगैर औपचारिकताओं को पूरा किये धड़ल्ले से नाजायज ढंग से निर्माण कराएं तो उन्हें कोई टोकने वाला नहीं है. साफ़ है कि ऐसे मामलों में सिस्टम को सब कुछ पता रहता है, लेकिन उन्हें नियमानुसार कार्य करने कराने में कोई दिलचस्पी नहीं. विडम्बना ही है.  


रविवार, 13 दिसंबर 2015

गाँव की संसद


रविवार (13/12/2015) दोपहर से ही उत्तरप्रदेश के गाँवों का माहौल बदला हुआ है. कहीं पटाखे दग रहे हैं तो कहीं ढोल नगाड़े माहौल की वास्तविकता का बयान कर रहे हैं. कहीं कहीं अपने ख़ास अंदाज में विजय जुलूस भी निकले, बधाइयों का आदान प्रदान हुआ, मिठाइयां बंटीं और रात गहराई तो डीजे की कानफोडू धुनों पर नाचने, थिरकने का दौर भी चला. और भी बहुत कुछ हुआ...क्या क्या गिनाएं...बेशक, यह कोई नयी बात नहीं है. हर जीत लोगों में अपार उत्साह का संचार करती ही है. यह स्वाभाविक प्रक्रिया है और इस दफा भी यही सब कुछ दिख रहा है. हाँ, विजय भाव की इस अभिव्यक्ति के पीछे उस समाज की भावना को तवज्जो, शायद, नहीं मिल पायी है जो इसके पीछे है. जिसकी वजह से यह जीत मिली, वह कहीं पीछे छूट गया है. ऐसा हर बार होता है...इस बार भी हुआ है...कोई फर्क नहीं...
लम्बी प्रकिया के बाद अंततः व्यवस्था के सबसे निचले पायदान वाली ‘गाँव की संसद’ का गठन एक बार फिर हो गया है. बड़ा शोर हुआ...एक दूसरे को मात देने के लिए अजब गजब तौर तरीके अपनाए गए. साम, दाम, दंड, भेद...सब कुछ. कहीं ‘चरण वंदना’ तो कहीं पुराने संबंधों का वास्ता, कहीं घात प्रतिघात तो कहीं विकास के खूबसूरत वादे. कहीं सकारात्मक पहल तो ज्यादातर जगहों पर घोर नकारात्मकता, खाऊ कमाऊ तौरतरीके. और जब नतीजे आये तो वह तबका ठगा सा महसूस करने लगा जिसने सोचा था कि शायद कुछ बेहतर हो. जिन तमाम गाँवों के बारे में मुझे जानकारी है, उनमे से ज्यादातर में नतीजे झकझोरने वाले हैं. बाजी वे सब के सब हार गए, जिन्होंने मतदाताओं से गाँव के बेहतर विकास का वादा किया लेकिन चवन्नी खर्च करने में कोताही करते रहे. मैदान उन्होंने मारा, जिन्होंने खूब दौलत लुटाई...वोट खरीदे...लोगों को खिलाया पिलाया...अब जो जीते हैं उनके घर में जश्न है...जो हारे वे कहीं दुबक गए हैं, हताश हैं. उस मानसिकता को कोस रहे हैं जो मतदाताओं को निहायत गैरजिम्मेदार प्रत्याशियों की तरफ खींच ले जाती है.
कहने की जरूरत नहीं कि गाँवों में भी बेहद ईमानदार ‘लोकल गवर्नमेंट’ की दरकार है. गाँवों को विभिन्न मदों में मिलने वाली रकम का विकास के कार्यों में समुचित सदुपयोग हो, यह बेहद जरूरी है. मनरेगा के धन का सही इस्तेमाल हो तो गाँवों का हुलिया बदल जाए. यह भी कह सकते हैं कि इस योजना का सही क्रियान्वयन हुआ होता तो अब तक हर गाँव आदर्श गाँव में तब्दील हो गया होता. लेकिन होता रहा ठीक उल्टा. गाँवों की गलियाँ आज भी दुरुस्त नहीं हैं. स्ट्रीट लाईट तो ज्यादातर गाँवों में है ही नहीं. तालाबों का जीर्णोद्धार महज कागजी है. हैंडपंप जहां लगने चाहिए, वहां शायद ही लगाए गए हों. उनकी मरम्मत बड़ी समस्या है. एक बात और- निर्णय लेने में पारदर्शिता होती तो बहुत से अच्छे कार्य हो सकते थे, हो सकते हैं.
लेकिन यह जरूरत शायद पूरी नहीं हुई. नए नए नुमाइंदे भी पहले दिन ही उसी राह पर जाते दिखे, जिस पर हमारे बड़े (सांसद, विधायक, ब्लाक प्रमुख, जिला पंचायत अध्यक्ष आदि) चले जाते हैं. यानी मौका मिलने पर उसी तबके को भूल जाना, जीने इन्हें मौक़ा दिया है. एक सज्जन कहने लगे, ‘यह तो पता था कि ये सब के सब मनमानी ही करने वाले हैं, लेकिन इन्हें सिर पर बैठाने वाले लोग पहले ही दिन पीछे छूट जाएंगे, ऐसी अपेक्षा तो न थी.’ जाहिर है, आसार अबकी बार भी अच्छे नहीं लगते.
दरअसल, हमें दरकार है अपने प्रतिनिधियों में विकास के प्रति गहरी तड़प की, उस जज्बे की जो हमें स्वच्छ भारत अभियान से जोड़े...हमें हमारे खेतों तक आसानी से पहुँच सुलभ कराये...बुनियादी सहूलियतों के लिए हमारे संघर्ष को गति दे...हमारे बच्चे सरकारी स्कूल में पहुंचें तो उन्हें समुचित माहौल मिले...हमारी गलियाँ, खड़ंजे, टूटी फूटी नालियां साफ़ सुथरी हों...तालाब किसी की मिल्कियत न बनने पायें...गलियों में अतिक्रमण न हो...गाँव के विकास के लिए योजनाओं का संचालन सर्वसम्मति से या फिर बहुमत के फैसले के आधार पर हो न कि ब्लाक कर्मियों और प्रधानों की मनमर्जी से...यह भी कि विकास सम्बन्धी सारे कार्य उन समितियों के माध्यम से ही कराये जाएं जो इसके लिए ही गठित होती हैं और साजिशन इनके अस्तित्व को नकार दिया जाता है. उम्मीद करें कि ऐसा होने लगे. हालांकि, शक है. वजह- जिन्होंने अकूत दौलत खर्च की है वे अपनी लागत निकालना चाहेंगे...उनके लिए सेवाभाव आवश्यक नहीं. और यह सब हो भी क्यों नहीं, मतदाताओं ने ही कौन सा नेक कार्य किया है. वक्त रहते किसी ने सोचा कि इस चुनावी कवायद का उद्देश्य विकास है...महज विकास, बाकी कुछ भी नहीं?

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

चेन्नई की त्रासदी


टेलीविजन के परदे पर फ्लैश हो रहीं चेन्नई की भयावह बाढ़ की तस्वीरें डराने वाली हैं. समूचा शहर बहता हुआ सा दिख रहा है. गलियों और सड़कों पर बाढ़ के पानी का प्रवाह इतना तेज है कि जान बचाकर भाग रहे लोगों का बचना मुश्किल हो रहा है. चारों तरफ तबाही का आलम...चीखते कराहते लोग...व्यवस्था को कोसते लोग...मदद की गुहार लगाते लोग...सड़ गल रही गृहस्थी को थोड़ा बहुत बचा लेने की जद्दोजहद में जुटे लोग और सरकारी बदइंतजामी का खमियाजा भुगतते रहने को अभिशप्त लोग...
सचमुच झकझोर देने वाले हैं हालात. अभी अभी फ्रांस में जलवायु सम्मलेन शुरू हुआ है, बड़ी बड़ी कसमें खायी जा रही हैं और दावे, वादे जा रहे हैं, चर्चाओं का दौर जारी है. इधर तमिलनाडु पानी पानी हो चुका है. चेतावनी यह भी है कि अभी एक दो दिन और बारी बारिश हो सकती है. सौ साल का रिकार्ड टूट चुका है और 188 से ज्यादा जानें जा चुकी हैं. परिवहन व्यवस्था चरमरा गयी है. और तो और चेन्नई एयरपोर्ट को भी बंद करना पड़ा है. स्कूल कालेज तो बंद हैं ही. इस आपदा से फौरी तौर पर निपटने के लिए, बेशक, केंद्र सरकार ने व्यापक कदम उठाए हैं, लेकिन जो आज तक नहीं हो सका है, चर्चा उस बात पर ज्यादा जरूरी है जिसके कारण बारिश शुरू होते ही भारतीय शहरों का दम घुटने लगता है. जरा गौर करें, जब चुनाव होते हैं तो मतदाताओं को रिझाने के लिए कोई दल मुफ्त टीवी देने की पेशकश करता है तो कोई लगभग मुफ्त में चावल और गेहूं. कोई कुछ और मुफ्त में देने का लालच देता है तो कोई कुछ...शायद ही किसी दल ने मतदाताओं को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की हो कि सत्ता में आने पर वह अत्याधुनिक ड्रेनेज सिस्टम देगा...साफ़ सफाई देगा और ऐसा माहौल देगा जिसमे लोग सुकून की सांस ले सकें.
यह कड़वी सच्चाई है कि चेन्नई का संकट जितना भारी बारिश की वजह से है उससे कहीं ज्यादा ड्रेनेज सिस्टम की विफलता की वजह से. यह संकट इस देश के हर शहर में है. इससे न दिल्ली उबर सकी है न मुम्बई और कोलकाता. बाकी शहर भी इसी संकट से रूबरू हैं. अफ़सोस इस बात का है कि चाँद और मंगल तक पहुँचने और तीव्र गति वाली ट्रेनें चलाने को आतुर देश के पास आज तक शहरों की बुनियादी समस्याओं से निपटने का कोई कारगर तंत्र तक नहीं बन पाया है. ऐसे में यह मानने को जी नहीं करता कि यह कभी देश स्मार्ट सिटी विकसित करने का सपना पूरा कर पायेगा.
जलवायु परिवर्तन, बेशक, हमारा कड़ा इम्तेहान ले रहा है. इससे निपटने के लिए अब तमाम कार्ययोजनाओं की चर्चा है. इन पर अमल होना ही चाहिए, लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि अपने मौजूदा शहरी और ग्रामीण ढाँचे को पहले चुस्त किया जाए. हमारे प्रधानमन्त्री अभी हाल में सिंगापुर में थे और वहां के विकास से प्रभावित भी थे. जैसी कि जानकारी है, सिंगापुर में मामूली बारिश नहीं होती, लेकिन वहां इस तरह का जलप्लावन होता हो, ऐसी जानकारी आज तक नहीं आई. जानकार बताते हैं कि वहां सफाई के मानक बहुत कड़े हैं और सार्वजनिक स्थानों पर गन्दगी करने वालों को कड़ी सजा का प्रावधान है. हमारे यहाँ ऐसा क़ानून बनाने का प्रयास हो भी तो शायद ही किसी दल को यह भाये. यहाँ तो जनहित के मसलों पर भी एकराय बन पाना मुश्किल है. अभी बुधवार (02/12/2015) का ही नजारा देखें. जब संसद में तमिलनाडु संकट पर चर्चा की बात आई तो कांग्रेस समेत कुछ दलों ने दीगर मुद्दों पर चर्चा का दबाव बनाया और मांग न माने जाने पर बायकाट कर दिया. साफ़ था कि उन्हें अपने राजनीतिक हितों की ज्यादा फ़िक्र थी, इस भारी विपदा से कराह रहे लोगों को उबारने की नहीं.
संकट बहुत गंभीर है. यह सिर्फ चेन्नई या फिर दक्षिण तमिलनाडु की त्रासदी नहीं है. उत्तरप्रदेश भी इसकी चपेट में है. रबी के सीजन में घनघोर बारिश, ओलावृष्टि और खरीफ के वक्त मानसून का गायब हो जाना. किसान बर्बाद हो चुके हैं, लेकिन व्यवस्था के नियामक आज तक किसानों को उबारने का विश्वसनीय वैकल्पिक ढांचा विकसित नहीं कर पाए हैं. वे कहने को कुछ भी कहें, लेकिन यह कड़वी सच्चाई है कि हमारे सत्ताधीशों में सच का सामना करने का साहस नहीं है. उत्तरप्रदेश की मौजूदा सरकार ने कहने को तो सिंचाई को मुफ्त कर दिया है, लेकिन असलियत यह है कि अगर किसानों को भरपूर पानी मिला होता तो धान की फसल इतना बर्बाद न होती. दूसरी तरफ जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर की त्रासदियों ने भी हमें हमारी लापरवाहियों के प्रति चेतावनी दे दी है. वस्तुतः कुदरत के बदलते बर्ताव ने हमारी जीवन शैली को कठघरे में खड़ा किया है. हमें इससे सबक सीखना ही होगा और हम ऐसा करने में विफल रहे तो मानवता के भविष्य पर आसन्न खतरे से बचना शायद ही मुमकिन हो और जब तक हम जागेंगे, तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी.

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

असहिष्णुता का गुब्बारा


मशहूर शायर निदा फाज़ली ने आखिर वह बात बड़ी साफगोई से कह दी जिसको लेकर इन दिनों ‘पूर्वाग्रहों’ का तूफ़ान खड़ा हुआ है. वह बोले, असहिष्णुता तो देश के महज सौ लोगों का खेल मात्र है. उनके बयान से चंद कलाकारों, नेताओं और उस तथाकथित बुद्धिजीवी तबके के कुछ लोगों के बयानों का गुब्बारा फुस्स हो गया होगा जो अब इस देश को रहने लायक नहीं मानते.
नरेन्द्र मोदी सरकार को लक्ष्य बनाकर विरोध के गोले दागने की कवायदें एक बार फिर उफान पर हैं. इस रवैये का प्रतिरोध भी अब तेज हो रहा है. खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिंगापुर में भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित करते हुए इशारों ही इशारों में सिद्धि और प्रसिद्धि की बात कही और साफ़ कर दिया कि ऐसे लोगों को कुछ दिन के लिए प्रसिद्धि भले ही मिल जाए, लेकिन सिद्धि नहीं मिलने वाली.
इसी कड़ी में बेहद सराहनीय कार्य किया जी न्यूज ने. उसके जुझारू रिपोर्टर ने पुलवामा जिले के आतंकग्रस्त एक गाँव का दौरा करके उस असहनीय पीड़ा की यादें ताजा कर दीं, जब, कुछ साल पहले आतंकवादियों भीषण जनसंहार किया था और उस मसले को लेकर एक भी साहित्यकार, फ़िल्मी कलाकार, कथित बुद्धिजीवी और समाजसेवी ने मुंह नहीं खोला. किसी ने तब अपने पुरस्कार लौटाने की हिम्मत नहीं दिखाई थी. चैनल ने यह सवाल भी उठाकर ऐसे लोगों को शर्मिंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि क्या अब भी इस तबके के लोग कुछ कहेंगे और यह कहकर दहला मारा कि नहीं, वे ऐसा हरगिज नहीं करेंगे. जिन मित्रों ने कल रात जी पर डेली न्यूज एंड एनालिसिस कार्यक्रम देखा, उनकी आँखें जरूर नाम हुई होंगी और ऐसे ‘बयानवीरों’ पर गुस्सा भी जरूर आया होगा, जो देश के सामने नैतिकता की नयी बेशर्मी से कुतर्क पर आमादा हैं.
बिहार चुनाव के बाद अहिष्णुता का शरारती अध्याय एकाएक बंद होता दिख रहा था, लेकिन इस देश की मिट्टी में पले बढ़े और मशहूर हुए अभिनेता आमिर खान ने चिंगारी को फिर हवा दे दी. अब उन्हें और उनकी हिन्दू पत्नी को यह देश असहिष्णु लगने लगा है. फिर क्या था, इसका उचित प्रतिकार होना ही था, होना भी चाहिए था. आखिर 103 करोड़ से ज्यादा हिन्दुओं की आबादी वाले इस देश में आमिर खान को जो शोहरत मिली उसमे इन हिन्दुओं का योगदान किसी भी अन्य बिरादरी से ज्यादा है. अगर हिन्दुओं का प्यार न मिला होता तो क्या आज इन्हें कोई जान पाता. कहीं गुम हो गए होते. ज़रा उनकी फिल्म पीके पर गौर करें. जब यह फिल्म प्रदर्शित हुई तो ऐसी आरोप लगे कि इसमें हिन्दू देवी देवताओं को अपमानित करने की कुचेष्टा की गयी है. हालांकि, इसके बावजूद यह फिल्म देश में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी और कोई अन्य फिल्म इसका रिकार्ड नहीं तोड़ पायी है. साफ़ तौर पर यह हिन्दुओं के बगैर संभव नहीं था. हिन्दुओं की सहिष्णुता का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है. प्रश्न यह है कि जिन हिन्दुओं ने इस कलाकार को सिर आँखों पर बिठाया, वे ही इनकी निगाह में असहिष्णु हैं? हद है.
बहरहाल, अब आशंका इस बात को लेकर व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह सब संसद के शीतकालीन सत्र के मद्देनजर तो नहीं हो रहा है. राष्ट्रीय राजनीति में धूल धूसरित कांग्रेस को, बेशक, यह सब खूब सुहा रहा होगा. इस दल ने लोकसभा में असहिष्णुता पर बहस के लिए बाकायदा नोटिस भी दे रखा है. बेशक ये बहस होनी चाहिए  और इस बहाने सत्ता पक्ष के पास यह अवसर है कि वह निहित स्वार्थी तत्वों का भांडा फोड़ने में कोताही न करे. केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने साम्प्रदायिक हिंसा से सम्बंधित तुलनात्मक आंकड़े जारी करके इस बारे में उचित पहल भी कर दी है. आमिर खान की टिप्पणी को सरकार ने मंगलवार को यह कहकर 'गलत' एवं 'अनुपयुक्त' बताया है कि ऐसे बयान देश के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए असम्मानजनक हैं। राष्ट्रीय राजधानी में सोमवार को एक अवार्ड कार्यक्रम में आमिर खान के बयान पर प्रतिक्रिया मांगे जाने पर केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा, ''असहिष्णुता पर उनकी टिप्पणी पूरी तरह से अनुपयुक्त है। इस तरह की टिप्पणियां देश एवं प्रधानमंत्री मोदी की छवि को खराब करेंगी।'' रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर 2015 तक 630 सांप्रदायिक वारदातें सामने आईं, जिनमें 86 लोग मारे गए और 1899 लोग घायल हुए। 2014 में 644 वारदातें सामने आईं, जिनमें 95 लोग मारे गए और 1921 लोग घायल हुए।
2013 में जब UPA-2 की सरकार थी, तब 823 वारदातें हुईं, जिनमें 133 लोग मारे गए और 2269 लोग घायल हुए।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2013 में महाराष्ट्र के धुले और उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में ही 70 लोग मारे गए थे और 100 से ज्यादा घायल हुए जबकि जुलाई 2014 के बाद यानी जबसे बीजेपी सत्ता में आई है तबसे 2014 में सिर्फ एक वारदात सहारनपुर में हुई, जिसमें तीन लोग मारे गए और 23 घायल हुए जबकि 2015 में अब तक कोई बड़ी सांप्रदायिक वारदात नहीं हुई है। इन तथ्यों के आलोक में ही सामना के सम्पादकीय में आमिर खान को ‘रणछोड़ दास’ घोषित कर दिया गया है.
हालांकि, अब खबर आ रही है कि संगीतकार ए.आर. रहमान भी इस विवाद में कूद पड़े हैं और उन्हें लगता है कि आमिर खान ने जो कहा, सच कहा. तय है कि देर सवेर इस राय का भी प्रतिकार होगा, होना भी चाहिए. कुल मिलाकर लब्बोलुबाब यह कि जिनका चश्मा देश में असहिष्णुता के दर्शन करा रहा है, वे शायद यह चाहते हैं कि लोग उनके प्रवचन (कुतर्क) को ध्यान से सुनें भर और प्रतिकार की कोशिश न करें. जो प्रतिकार करेगा, वह इनकी नजर में असहिष्णु है. अब ऐसा तो नहीं चलने वाला है देश में. 

शनिवार, 21 नवंबर 2015

अपने अपने दांव

तीन चार दिन से गाँव में हूँ और यह देखकर सचमुच आश्चर्य हो रहा है कि माहौल अजीबोगरीब ढंग से बदला हुआ है. कोई नया विकास कार्य नहीं है...आगे भी इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं है. अभी तो बस चुनाव की चर्चा है...प्रधानी के चुनाव की. सीट अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित हो गयी है, इसलिए पिछले कई महीनों से ख्याली पुलाव पका रहे सवर्णों को जैसे सांप सूंघ गया है, सारे ‘अरमान’ धूल धूसरित हो गए हैं और हताशा के इस माहौल में अब वे नयी नयी भूमिकाओं में आ गए हैं. कोई किसी का सलाहकार बन गया है तो कई ‘राजनीतिक विश्लेषक’ की भूमिका में आ गए हैं. किसी को फ़िक्र है कि पुराने मुखिया का कैंडीडेट जीतने न पाए तो किसी को अपनी धाक जमा लेने की फ़िक्र है. एक बात साफ़ है- इस धमाचौकड़ी में ग्रामीण संसद के इस यज्ञ के वास्तविक उद्देश्य नदारद हैं...वह भावना कहीं नहीं परिलक्षित हो रही, जिसमे गाँव के विकास की ललक दिखे. अब तो बस मौकापरस्ती है. शार्ट टर्म गेम प्लान है. बस अपने अपने दांव.
रमरजवा खटिया बहुत अच्छी बीन लेता है, लेकिन यह कोई 10-15 साल पहले की कहानी है. अब तो बेटा कमाने लगा है. चार पैसे बचाकर भेज देता है तो उसका भी पेट आसानी से भर जाता है. यही वजह है कि उसने यह काम बंद ही कर दिया था. मुखिया की हलवाही भी छोड़ चुका है. अब अचानक चुनाव आया और सीट रिजर्व हो गयी तो उसकी महत्वाकांक्षाओं ने भी जोर मारा. किसी ने बताया कि वह दो तीन हफ्ते से किसी न किसी के यहाँ खटिया बीनते देखा जा रहा है. वजह- वह भी प्रत्याशी है और ‘बिना सेवा के मेवा कहाँ.’ बाद में पता चला कि सीट अनुसूचित जाति महिला के लिए रिजर्व हो गयी तो उसने बहू को मैदान में उतार दिया है. हाँ, पूरे गाँव में उसका पुराना सेवा भाव चरम पर है और चालाक किस्म के लोग उसका भरपूर फायदा उठा रहे हैं.
अभी कल की बात है. मैं सुबह उठा ही था कि पता चला कि कुछ लोग मिलने आये है. बाहर आया तो एक सज्जन मिले. मुम्बई में कमाते हैं. पैसा बना लिया है, अब गाँव वालों को भी ‘बनाना’ चाहते हैं. बोले, ‘भईया हम भी मैदान में आ गए हैं...आशीर्वाद चाहिए.’ एकदम खड़ी बोली...सीधी सपाट. मुझे सुखद एहसास हुआ कि यह तबका भी समाज में अपनी जगह बना रहा है. अच्छी बात है. मैंने पूछा, गाँव के लिए कोई अच्छा प्लान है...? वह हिचकिचाया. कहने लगा, ‘भईया....ऊ तो हो ही जाएगा...पहले कामयाबी तो मिले.’ मैं भौंचक था. खासकर इसलिए भी कि वह पढ़ा लिखा है. तो क्या सिर्फ मनरेगा की दौलत के लालच में वह भी कैद हो गया है. मुझे धक्का लगा.
मेरे गाँव में अगर कोई सबसे ज्यादा मेहनती है तो वह हैं प्यारेलाल. गाँव का हर शख्स उनकी कद्र करता है...उनकी नहीं बल्कि उनकी मेहनत की. गाँव में मजूरी करते करते ऊब गए तो बगल के कस्बे में एक दूकान में काम करना शुरू किया. तीन चार हजार रुपये महीना कमा लेते हैं. आजकल प्यारेलाल भी गाँव आये हैं और मैंने देखा, उनका सेवा भाव आज भी जस का तस है. हर आदमी उनसे अपना आधा अधूरा पडा काम करा लेना चाहता है. लगे हाथ वे अपना प्रचार भी कर ले रहे हैं. उनकी बहू चुनाव मैदान में है.
कुछ ऐसे और पात्र अपनी अपनी ‘काबिलियत’ साबित करने की कोशिश में हैं. सुबह से लेकर शाम तक उनका वक्त गाँव के लोगों की ‘चरण वंदना’ करने में जाया हो रहा है. जो जिस काबिल है, उस तरह की सेवा की पेशकश कर रहा है. और दूसरी तरफ कुछ घाघ किस्म के लोग इस फितूर में लगे हैं कि कैसे इस ‘स्वर्णिम मौके’ का लाभ उठा लिया जाए... बस. एक सज्जन कहने लगे, ‘चाचा, जो अधूरे काम हैं, उन्हें पूरा करा लिया जाए...उसके बाद कोई किसी की नहीं सुनेगा. मुझे आश्चर्य हुआ...कितनी मौकापरस्ती आ गयी है समाज में...कितना उथला सोचने लगे हैं लोग...एक दूजे को मात देने की ताक में बैठे लोग और कितना गिरेंगे...किसी को गाँव की बेहतरी की फ़िक्र नहीं...सिर्फ मौकापरस्ती...सवाल यह है कि क्या इसीलिए ग्राम पंचायतों का इतना बड़ा यज्ञ चल रहा है. है कोई देखने समझने वाला...

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

अब तुम कहाँ

अब कहाँ हो तुम मैंने अचानक घुमड़े बादलों से भी पूछा वह लाचार याद आया तुम्हारा वह सवाल 'कहाँ रहते हो तुम दिखते रहा करो'.

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

गहराता संकट

यह सचमुच विडम्बना ही है कि ऐसे समय में जबकि भयावह सूखे का सामना कर रहे किसानों को भरपूर मदद की दरकार है, हमारी व्यवस्था के नियामक अपनी अपनी राजनीति चमकाने में व्यस्त हैं. एक के बाद एक चुनावों में बाजी मारने की कवायद में वे यह भूल से चुके हैं कि अगर किसान का अस्तित्व संकट में पड़ा तो कोई भी कहीं का न रहेगा. मानसून ने अबकी बार, ख़ास तौर से उत्तर भारत में, जो रंग दिखाए हैं, वे बेहद हतोत्साहित करने वाले हैं. इनमें भी उत्तरप्रदेश कई इलाकों में हालात बेहद दयनीय हो चले हैं. इलाहाबाद, फतेहपुर, उन्नाव, हरदोई, इटावा, मैनपुरी और आसपास के जिले हों या फिर बुंदेलखंड क्षेत्र के यूपी वाले हिस्से में आने वाले चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, महोबा, उरई, झांसी और ललितपुर जिले, हर जगह किसानों की हालत पतली है. खरीफ की फसलें तबाह हो चुकी हैं और रबी के आसार भी बहुत अच्छे नहीं. इन इलाकों में सिंचाई के अभाव में धान की फसल चौपट हो चुकी है और ज्वार, बाजरा, उड़द, तिल, अरहर व अन्य फसलें भी कुम्हला रही हैं.
जिन दिनों उत्तरप्रदेश सरकार के जिम्मेदार लोग किसानों को सिंचाई के लिए भरपूर पानी देने के वादे कर रहे थे, आशंका तभी से थी कि ये वादे शायद ही पूरे हों और हुआ भी वही. किसानों ने धान की पौध तो येन केन प्रकारेण तैयार कर ली, मगर ज्यादातर इलाकों में रोपाई की नौबत नहीं आई. नहरों का समूचा तंत्र फेल सा हो गया, महकमे के इंजीनियर शहरों में बैठे बैठे ठंडी हवा खाते रहे और सारी उम्मीदें चकनाचूर होती रहीं. उत्तरप्रदेश सरकार मीडिया में विज्ञापनों के जरिए ढिंढोरा पीटती रही कि उसने सिंचाई शुल्क माफ़ करके किसानों पर बड़ा उपकार किया है और दूसरी तरफ किसान सूखी नहरों को देखकर सिर धुनते रहे. कुछ बड़ी नहरों में, बेशक पानी दौड़ाया गया, लेकिन छोटी नहरें अपने कायाकल्प के लिए ही आंसू बहाती रह गयीं. न तो इनकी सफाई कराई गयी और न ही किसी ने मौका मुआयना करके यह जानने की कोशिश की कि वस्तुतः हालात क्या हैं. नतीजा- छोटी नहरों की टेल तक आज भी पानी नहीं है. इलाहाबाद में कौंधियारा ब्लाक के जिस एक छोटे से गाँव से मेरा ताल्लुक है, कहने को वहां के किसानों को तीन नहरों से पानी मिलता है, लेकिन एक बड़ी नहर को छोड़कर बाकी की दो नहरें किसानों को रुलाती ही रह गयीं. सैकड़ों किसानों के खेतों में धूल उड़ रही है और पलायन के हालात हैं. कभी ऐसा नहीं हुआ कि सिंचाई विभाग के किसी जिम्मेदार अभियंता ने दौरा करके यह जानने की कोशिश की हो कि आखिर वस्तुस्थिति क्या है.
इधर बुंदेलखंड से जुड़े जिलों में भी फसल तबाह हो चुकी है. यहाँ आये दिन किसी न किसी किसान के फांसी पर झूल जाने या फिर हार्ट अटैक से मौत हो जाने की ख़बरें आती रहती हैं. ज़रा तमाशा देखें कि अकेले चित्रकूट जिले में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जिन छोटे छोटे चेक डैम का निर्माण हुआ, वे एक भी बरसात नहीं झेल सके. बालू की दीवारें पानी को रोकने के बजाय खुद पानी में बह गयीं. जांच के बड़े बड़े वादे हुए, लेकिन दोषियों का आज तक कुछ नहीं बिगड़ा. गरीब किसान आज भी जहां का तहां है.
एक संकट यह भी है कि जिस मनरेगा को गाँवों की काया पलटने वाली स्कीम बताया जा रहा है, वह प्रधानों, विकास अधिकारियों की चेरी मात्र बनकर रह गयी है. सरकार भले ही इस योजना की वाहवाही करने में जुटी है, पर इसमें मची लूट के किस्से कहीं भी देखे सुने जा सकते हैं. मनरेगा के जिस बजट से छोटी नहरों की सफाई कराई जा सकती थी, वह भी नहीं हुई. कोई पूछने वाला नहीं है कि आखिर यह अंधेर क्यों और कैसे हो रही है.
और अपना मीडिया...इसकी क्या तारीफ़ की जाए. यह तो बीफ, सांप्रदायिक वैमनस्य, चुनाव, नेताओं के बेतुके बोल और इसी तरह के बेहूदा प्रसंगों में वक्त जाया करने में लगा है. बहुतों को बुरा लग सकता है, लेकिन मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि गाँवों के किसानों और गरीबों की दुर्दशा की कहानी साप्ताहिक क्रम से भी प्रसारित करके वह बड़ा काम कर सकता था. लेकिन यह नहीं होने वाला. उसे अरहर की दाल और प्याज की बढ़ती कीमतों से तो मतलब है, लेकिन इन जिंसों को उपजाने वाले किसानों की फटेहाली से कोई लेना देना नहीं. हद है.....