वर्षों पूर्व
इलाहाबाद के एक उत्साही युवा वैज्ञानिक अजय सोनकर ने अपने अथक प्रयासों से कृत्रिम
मोती विकसित करने में सफलता पायी थी. तब तक यह धारणा आम थी कि सीपियों के माध्यम
से उत्पन्न होने वाला यह कृत्रिम मोती खारे पानी में बेहतर ढंग से विकसित होता है.
सोनकर ने अपना प्रयोग मीठे पानी में किया और वह कामयाब रहे. उनकी इस कामयाबी के
चर्चे स्थानीय मीडिया में शुरू होते ही कृत्रिम मोती के उत्पादन से जुड़ी अमेरिकी
और जापानी कंपनियों ने उनसे संपर्क साधने में ज़रा भी देर नहीं लगाई और इस तरह उनके
पास साथ साथ काम करने के प्रस्तावों की झड़ी लग गयी.
उसी दौरान
उत्तरप्रदेश की तत्कालीन मायावती सरकार के कैबिनेट मंत्री आरके चौधरी इलाहाबाद
तशरीफ़ लाये तो उन्हें इस बारे में जानकारी दी गयी. अच्छा हुआ कि श्री चौधरी ने तब
सोनकर की मामा भांजा तालाब स्थित प्रयोगशाला का दौरा किया और हर तरह की मदद के लिए
लखनऊ आने का निमंत्रण दिया. बहरहाल...यहाँ मुद्दा यह नहीं कि सोनकर उनके प्रस्ताव
पर लखनऊ गए या नहीं. मुद्दा यह है कि सोनकर की जिस उपलब्धि की जानकारी विदेशी
एजेंसियों को पहले हो गयी, वह राज्य सरकार को तब तक पता नहीं थी, जब तक चौधरी को
वहां ले नहीं जाया गया. हालांकि, उसके बाद भी राज्य सरकार की तरफ से एक होनहार
वैज्ञानिक को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया. सोनकर ने अपने
संसाधनों के बल पर तरह तरह के रंगीन और डिजाइनर मोतियों का उत्पादन करने में सफलता
पायी, जो बाद में खूब शोहरत हासिल करते रहे...
खैर...यह प्रकरण इसलिए
याद आया क्योंकि हाल ही में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जो बताती हैं कि हमारी व्यवस्था
के नियामक तब तक कुछ जान समझ नहीं पाते जब तक कि मीडिया में उनके चर्चे आम न हो
जाएं. इन्हीं में से एक घटना है लुधियाना में आयोजित हुई 68वीं नेशनल साइकिलिंग चैम्पियनशिप
प्रतियोगिता की. इस प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए लुधियाना पहुंचे यूपी
साइकिलिंग एसोसिएशन के 21 बच्चे महज एक साइकिल से अभ्यास करने को बाध्य होते दिखे.
यह मसला जब मीडिया की सुर्ख़ियों में आया तब कहीं जाकर सत्ता प्रतिष्ठान इसकी
जानकारी हो पायी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इन युवकों को साइकिल उपलब्ध कराने
का आदेश दिया. अखिल भारतीय स्तर की इस प्रतियोगिता में भागीदारी के लिए पहुंचे इन
बच्चों का उत्साह काबिलेतारीफ रहा, लेकिन हमारे बच्चे साइकिल तक के लिए तरसें, यह
जानकर कोफ़्त होती है. बेशक, प्रतियोगिता में शामिल बच्चे किसी सरकारी संगठन के
माध्यम से वहां नहीं गए थे. फिरभी, यह तो कहा ही जा सकता है कि सरकारी अमले को
इसकी जानकारी होनी ही चाहिए थी.
एक अन्य घटना
सचिवालय में हुई. मुख्यमंत्री तथा अन्य महत्वपूर्ण लोगों के लिए आरक्षित लिफ्ट हाल
ही में ऐसी बिगड़ी कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिम्पल यादव लगभग आधा
घंटा तक उसी में फंसे रहे. जैसे तैसे मुख्यमंत्री को सकुशल निकाला तो गया लेकिन इस
घटना ने एक बड़ा सवाल भी छोड़ दिया. क्या व्यवस्था संभालने वालों को समय रहते कुछ भी
पता नहीं होता. सवाल यह है कि आखिर लिफ्ट को त्रुटि मुक्त क्यों नहीं रखा जा सका.
जब हमारे महत्वपूर्ण लोगों के लिए की गयी व्यवस्था इस तरह जर्जर होगी तो सामान्य
आदमी की सुविधाओं का क्या हाल होगा, कल्पना ही की जा सकती है. इस सम्बन्ध में
सिर्फ दो ही वजहें हो सकती हैं- या तो व्यवस्था संभाल रहे लोगों को कुछ पता ही
नहीं या फिर उन्हें अपने दायित्वों को पूरा करने में कोई रूचि नहीं. साफ़ है- हमारा
सिस्टम आज भी महज ऊंघने वालों के हाथों में गिरवी है, कहने को कुछ भी कहते रहा
जाए.
दरअसल हमारी
व्यवस्था आज भी कुछ यूं चल रही है जहां लोगों को बताने के लिए तो बहुत कुछ होता
है, लेकिन जानने में किसी की दिलचस्पी नहीं. कहीं होहल्ला न हो तो सिस्टम के लोग
कभी भी जनता जनार्दन का हाल जानने का कष्ट न करें. अब देखिये न- नौकरशाही को साफ़
निर्देश हैं कि गाँवों का दौरा करके वहां के हालात को बारीकी से देखा जाए और यह भी
पता लगाया जाए कि विकास योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति क्या है, लेकिन
कितने अफसरों ने इस सम्बन्ध में रूचि ली, यह भी क्या बताने की जरूरत है. शायद यही
वजह है कि अच्छी से अच्छी विकास योजनाएं धरातल पर दम तोड़ देती हैं और सत्ता प्रतिष्ठान
को उसकी पूरी खबर तक नहीं होती.
सच तो यह है कि आज
भी हमारे सरकारी महकमों को जनता की आवश्यकताओं की पर्याप्त जानकारी नहीं है. ज़रा
नमूने देखें- सिंचाई विभाग के अधिकतर दफ्तर शहरों में स्थापित हैं. लगभग सारे
अभियंता शहरों में ही निवास कर रहे हैं. आसानी से समझा जा सकता है कि इन्हें किसानों की सिंचाई सम्बन्धी
समस्याओं की कितनी जानकारी होगी. परिणाम- जब खेतों को पानी की जरूरत होती है तो
नहरें अक्सर सूखी रहती हैं और जब जरूरत नहीं होती है तो नहरों में पानी उतराता
रहता है. अब ऐसे में किसानों का कितना भला होगा, आसानी से समझा जा सकता है.
इलाहाबाद में यमुनापार स्थित एक किसान रामायण प्रसाद पाठक कहते हैं, ‘हमारे सिस्टम
को किसानों की जरूरतों की सम्पूर्ण जानकारी है ही नहीं. पानी तब मिलता है, जब इसकी
जरूरत ही नहीं होती. ढिंढोरा महज इस बात का पीटा जाता है कि सरकार ने सिंचाई मुफ्त
कर दी है. आदर्श स्थिति तो यह होती कि सिंचाई के लिए बारहों महीने पानी की
उपलब्धता सुनिश्चित की जाती और गर्मियों में भी किसान कुछ न कुछ फसल उगाते. ऐसा
होता तो किसानों को सिंचाई का पैसा देने में कोई एतराज नहीं होता.’
इसी तरह बिजली
आपूर्ति, ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े तमाम कर्मी गाँवों
में जाकर वास्तविक आवश्यकताओं को जानने समझने की जहमत नहीं उठाते. ऐसे में कैसे
माना जाए कि सिस्टम को वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी होगी. शहरों में कोई
मध्यम या गरीब तबके का व्यक्ति अपना मकान बनवाने लगे तो सम्बंधित प्राधिकरण का
कर्मचारी फ़ौरन वहां पहुँच जाएगा और तरह तरह के क़ानून बताकर निर्माण में व्यवधान
डालेगा, लेकिन बड़े बड़े बिल्डर धड़ल्ले से बगैर औपचारिकताओं को पूरा किये धड़ल्ले से
नाजायज ढंग से निर्माण कराएं तो उन्हें कोई टोकने वाला नहीं है. साफ़ है कि ऐसे
मामलों में सिस्टम को सब कुछ पता रहता है, लेकिन उन्हें नियमानुसार कार्य करने
कराने में कोई दिलचस्पी नहीं. विडम्बना ही है.