मंगलवार, 24 नवंबर 2015

असहिष्णुता का गुब्बारा


मशहूर शायर निदा फाज़ली ने आखिर वह बात बड़ी साफगोई से कह दी जिसको लेकर इन दिनों ‘पूर्वाग्रहों’ का तूफ़ान खड़ा हुआ है. वह बोले, असहिष्णुता तो देश के महज सौ लोगों का खेल मात्र है. उनके बयान से चंद कलाकारों, नेताओं और उस तथाकथित बुद्धिजीवी तबके के कुछ लोगों के बयानों का गुब्बारा फुस्स हो गया होगा जो अब इस देश को रहने लायक नहीं मानते.
नरेन्द्र मोदी सरकार को लक्ष्य बनाकर विरोध के गोले दागने की कवायदें एक बार फिर उफान पर हैं. इस रवैये का प्रतिरोध भी अब तेज हो रहा है. खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिंगापुर में भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित करते हुए इशारों ही इशारों में सिद्धि और प्रसिद्धि की बात कही और साफ़ कर दिया कि ऐसे लोगों को कुछ दिन के लिए प्रसिद्धि भले ही मिल जाए, लेकिन सिद्धि नहीं मिलने वाली.
इसी कड़ी में बेहद सराहनीय कार्य किया जी न्यूज ने. उसके जुझारू रिपोर्टर ने पुलवामा जिले के आतंकग्रस्त एक गाँव का दौरा करके उस असहनीय पीड़ा की यादें ताजा कर दीं, जब, कुछ साल पहले आतंकवादियों भीषण जनसंहार किया था और उस मसले को लेकर एक भी साहित्यकार, फ़िल्मी कलाकार, कथित बुद्धिजीवी और समाजसेवी ने मुंह नहीं खोला. किसी ने तब अपने पुरस्कार लौटाने की हिम्मत नहीं दिखाई थी. चैनल ने यह सवाल भी उठाकर ऐसे लोगों को शर्मिंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि क्या अब भी इस तबके के लोग कुछ कहेंगे और यह कहकर दहला मारा कि नहीं, वे ऐसा हरगिज नहीं करेंगे. जिन मित्रों ने कल रात जी पर डेली न्यूज एंड एनालिसिस कार्यक्रम देखा, उनकी आँखें जरूर नाम हुई होंगी और ऐसे ‘बयानवीरों’ पर गुस्सा भी जरूर आया होगा, जो देश के सामने नैतिकता की नयी बेशर्मी से कुतर्क पर आमादा हैं.
बिहार चुनाव के बाद अहिष्णुता का शरारती अध्याय एकाएक बंद होता दिख रहा था, लेकिन इस देश की मिट्टी में पले बढ़े और मशहूर हुए अभिनेता आमिर खान ने चिंगारी को फिर हवा दे दी. अब उन्हें और उनकी हिन्दू पत्नी को यह देश असहिष्णु लगने लगा है. फिर क्या था, इसका उचित प्रतिकार होना ही था, होना भी चाहिए था. आखिर 103 करोड़ से ज्यादा हिन्दुओं की आबादी वाले इस देश में आमिर खान को जो शोहरत मिली उसमे इन हिन्दुओं का योगदान किसी भी अन्य बिरादरी से ज्यादा है. अगर हिन्दुओं का प्यार न मिला होता तो क्या आज इन्हें कोई जान पाता. कहीं गुम हो गए होते. ज़रा उनकी फिल्म पीके पर गौर करें. जब यह फिल्म प्रदर्शित हुई तो ऐसी आरोप लगे कि इसमें हिन्दू देवी देवताओं को अपमानित करने की कुचेष्टा की गयी है. हालांकि, इसके बावजूद यह फिल्म देश में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी और कोई अन्य फिल्म इसका रिकार्ड नहीं तोड़ पायी है. साफ़ तौर पर यह हिन्दुओं के बगैर संभव नहीं था. हिन्दुओं की सहिष्णुता का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है. प्रश्न यह है कि जिन हिन्दुओं ने इस कलाकार को सिर आँखों पर बिठाया, वे ही इनकी निगाह में असहिष्णु हैं? हद है.
बहरहाल, अब आशंका इस बात को लेकर व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह सब संसद के शीतकालीन सत्र के मद्देनजर तो नहीं हो रहा है. राष्ट्रीय राजनीति में धूल धूसरित कांग्रेस को, बेशक, यह सब खूब सुहा रहा होगा. इस दल ने लोकसभा में असहिष्णुता पर बहस के लिए बाकायदा नोटिस भी दे रखा है. बेशक ये बहस होनी चाहिए  और इस बहाने सत्ता पक्ष के पास यह अवसर है कि वह निहित स्वार्थी तत्वों का भांडा फोड़ने में कोताही न करे. केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने साम्प्रदायिक हिंसा से सम्बंधित तुलनात्मक आंकड़े जारी करके इस बारे में उचित पहल भी कर दी है. आमिर खान की टिप्पणी को सरकार ने मंगलवार को यह कहकर 'गलत' एवं 'अनुपयुक्त' बताया है कि ऐसे बयान देश के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए असम्मानजनक हैं। राष्ट्रीय राजधानी में सोमवार को एक अवार्ड कार्यक्रम में आमिर खान के बयान पर प्रतिक्रिया मांगे जाने पर केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा, ''असहिष्णुता पर उनकी टिप्पणी पूरी तरह से अनुपयुक्त है। इस तरह की टिप्पणियां देश एवं प्रधानमंत्री मोदी की छवि को खराब करेंगी।'' रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर 2015 तक 630 सांप्रदायिक वारदातें सामने आईं, जिनमें 86 लोग मारे गए और 1899 लोग घायल हुए। 2014 में 644 वारदातें सामने आईं, जिनमें 95 लोग मारे गए और 1921 लोग घायल हुए।
2013 में जब UPA-2 की सरकार थी, तब 823 वारदातें हुईं, जिनमें 133 लोग मारे गए और 2269 लोग घायल हुए।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2013 में महाराष्ट्र के धुले और उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में ही 70 लोग मारे गए थे और 100 से ज्यादा घायल हुए जबकि जुलाई 2014 के बाद यानी जबसे बीजेपी सत्ता में आई है तबसे 2014 में सिर्फ एक वारदात सहारनपुर में हुई, जिसमें तीन लोग मारे गए और 23 घायल हुए जबकि 2015 में अब तक कोई बड़ी सांप्रदायिक वारदात नहीं हुई है। इन तथ्यों के आलोक में ही सामना के सम्पादकीय में आमिर खान को ‘रणछोड़ दास’ घोषित कर दिया गया है.
हालांकि, अब खबर आ रही है कि संगीतकार ए.आर. रहमान भी इस विवाद में कूद पड़े हैं और उन्हें लगता है कि आमिर खान ने जो कहा, सच कहा. तय है कि देर सवेर इस राय का भी प्रतिकार होगा, होना भी चाहिए. कुल मिलाकर लब्बोलुबाब यह कि जिनका चश्मा देश में असहिष्णुता के दर्शन करा रहा है, वे शायद यह चाहते हैं कि लोग उनके प्रवचन (कुतर्क) को ध्यान से सुनें भर और प्रतिकार की कोशिश न करें. जो प्रतिकार करेगा, वह इनकी नजर में असहिष्णु है. अब ऐसा तो नहीं चलने वाला है देश में. 

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