शनिवार, 16 मई 2015

बदहाली की दास्तां

इलाहाबाद से करीब 25 किलोमीटर दक्षिण रीवा रोड से लगा एक गांव है मवैया, जमीन बेहद उपजाऊ, सिंचाई के लिए नहर उपलब्ध, धान और गेहूं की फसलें लहलहाती हैं तो देखते ही बनता है. दिल खुश हो जाता है. लेकिन ऐसा तब होता है जब हालात अनुकूल हों, मौसम साथ दे और सिंचाई विभाग भी मेहरबान रहे. हालांकि ऐसा अमूमन होता नहीं. या तो बारिश समय पर नहीं होगी या फिर नहरों में समय से पानी नहीं छोड़ा जाएगा. अगर सब कुछ ठीक रहा तो फसल पकते पकते बेमौसम बारिश या फिर ओलावृष्टि का खतरा मंडराता रहेगा. बेहद समतल भूभाग पर बसे इस गाँव का ‘पाताल’ भी किसानों पर ही चोट करता है. अक्सर अवर्षा और सिंचाई विभाग की कारस्तानियों से आजिज कुछ किसानों ने निजी ट्यूबवेल लगवाने के लिए बोरिंग कराने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. करीब 65-70 फिट गहरे में पहाड़ से मुकाबला होता है, जिसकी मोटाई दो ढाई सौ फिट के आसपास है. बेशक अब ऐसी मशीनें आ गयी हैं जो इतना मोटा पहाड़ आसानी से छेद सकती हैं, पर इन मशीनों की सुविधा इस गाँव से सम्बंधित ब्लाक में आज तक नहीं है. नतीजा- अच्छा भला गाँव बेहाल है.
आसपास के गाँव भी ऐसे ही स्थिति से दो चार हैं, जहां मौसम और सिंचाई विभाग मिलकर किसानों का बेड़ा गर्क करते हैं. कोढ़ में खाज तब होती है जब मौसम एकदम ही मनमानी पर उतारू हो जाए, जैसे इस साल हुआ. अवर्षा की स्थिति और सिंचाई विभाग की कारस्तानियों से किसान कराह ही रहा था कि रबी के सीजन में शुरू हो गया अंधाधुंध बारिश का दौर. पहले तो किसानों के चेहरे खिले क्योंकि पानी पाकर फसल लहलहा उठी थी, लेकिन जब यह दौर लम्बा खिंचने लगा तो उनकी रूह कांपी. तूफानी बारिश में गेहूं और रबी की अन्य फसलें खेतों में ऐसे पलटीं कि फिर उठ न सकीं. दाने कुम्हला गए, पतले पड़ गए और कहीं कहीं तो फसल ही सड़ गयी. रही सही कसर भयावह ओलावृष्टि ने पूरी कर दी. इससे फसलों का तो सत्यानाश ही हो गया. और हाँ, किसी भी सरकारी नुमाइंदे ने कम से कम इस इलाके की तरफ झाँका तक नहीं. नुकसान एक तिहाई से ज्यादा ही हुआ है.
यह तो रहा उन मैदानी इलाकों का हाल, जहां उपज सामान्य ढंग से अपेक्षित रहती है. इलाहाबाद के दक्षिणी पश्चिमी भूभाग में स्थित उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में आने वाले चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, महोबा, उरई, झांसी और ललितपुर जिलों का हाल तो और भी बुरा है. इन जिलों में बेमौसम की बारिश और ओलावृष्टि ने भीषण तबाही मचाई. चित्रकूट जिले का पाठा क्षेत्र वैसे भी ज्यादातर ऊबड़ खाबड़ ही है. सिंचाई के संसाधन न के बराबर हैं, लेकिन इस साल फसल जितनी अच्छी थी, उतनी ही बर्बाद भी हुई. संसाधनों के मामले में भी बेहद गरीब किसान, मजदूर हालात सुधरने की बाट ही जोहते रह गए और जब भयावह ओलावृष्टि और बारिश का कोप थमा, तब तक सब बर्बाद हो चुका था. बांदा, हमीरपुर में भी मौसम ने ख़ासा कहर बरपाया. झांसी और ललितपुर भी ऊबड़खाबड़ जमीन पर आबाद हैं. सिंचाई के संसाधन हैं लेकिन मैदानी इलाकों जैसे नहीं. यहाँ भी कुदरत ने भयावह विनाश गाथा लिखी.
बुंदेलखंड को बाहर के लोग प्रायः उसकी वीरगाथाओं के जरिए जानते हैं. रानी झांसी, आल्हा, ऊदल, काला सैयद और कई शूरवीरों ने अपने अपने समय में जो गौरव गाथा लिखी, उसके स्मृति अवशेष आज तक यहाँ वहां पसरे देखे जा सकते हैं. चित्रकूट तो भगवान राम के पुण्य स्मरण की भूमि है ही. अपने झरनों, बीहड़ों के बीच प्रचुर खनिज सम्पदा के बल पर जिस इलाके में सम्पन्नता की बयार बहनी चाहिए थी, वह विपन्नता की त्रासदी झेलते झेलते टूट चुका है. कुछेक तबकों को छोड़ दें तो बाकी का यहाँ कोई पुरसाहाल नहीं. दुनिया भर में अपनी ताकत का लोहा मनवा रहे देश का यह इलाका बहुत कमजोर हो  गया है. खेती किसानी चौपट हो चुकी है, जिसके चलते मजदूरों का पलायन बढ़ा है. शासन, प्रशासन के नुमाइंदे हालांकि पलायन की बात नहीं मानते, लेकिन किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं कि आखिर साल के सात आठ महीनों तक यहाँ के लाखों मजदूरों के घरों में ताले क्यों लगे रहते हैं. ख़बरें हैं कि अकेले महोबा जिले के चरखारी तहसील क्षेत्र में 20 हजार से ज्यादा मजदूर पलायन को बाध्य हैं. हमीरपुर और महोबा के अन्य इलाकों में भी दो वक्त की रोटी के लिए ‘पलायन’ एक बड़ी समस्या है. यहाँ के मजदूर आसपास के जिलों और प्रान्तों के ईंट भट्ठों पर मेहनत मजदूरी कर पेट पाल रहे हैं. खेतीबाड़ी के मौसम में वे लौटते हैं, लेकिन इस साल तो यह अवसर भी अपेक्षित ढंग से हाथ नहीं लगा. महोबा में फसलों को 70 से 80 फीसद तक का नुकसान बताया जा रहा है. चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, झांसी, ललितपुर और उरई में भी कहीं 60-70 तो कहीं 80-90 फीसद तक नुकसान आँका जा रहा है. झांसी पहुंचे केन्द्रीय सर्वेक्षण दल ने भी मीडिया के सामने फौरी तौर पर 80 फीसद नुकसान की बात मानी थी.
एक बात और- बुंदेलखंड में मौसम पिछले कई वर्षों से रूठा हुआ है. चित्रकूट तो पिछले साल भी ओलावृष्टि से तबाह हुआ था. बाकी जिलों में भी किसान एक अदद भरपूर फसल के लिए तरस रहे हैं. कभी सूखा, कभी अति वृष्टि तो कभी ओले- इन सब ने मिलकर ऐसा कहर ढाया है कि किसान कहीं के नहीं रहे. कुछ गैर सरकारी संगठनों की मानें तो वर्ष 2003 से लेकर अब तक बुंदेलखंड के करीब चार हजार किसान मौत को गले लगा चुके हैं. इस साल भी फसल की बर्बादी देखकर सैकड़ों किसानों ने आत्महत्या की या फिर दिल का दौरा पड़ने से चल बसे. इस परिस्थिति में किसानों की विधवाएं बेसहारा हुईं, बेटियों का व्याह मुश्किल हुआ, बच्चों की पढाई लिखाई बाधित हुई और दो वक्त की रोटी का प्रबंध मुहाल हो गया.
उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड के अलावा अन्य इलाकों में भी अबकी बार बारिश और ओलावृष्टि ने भारी तबाही मचाई. फर्रुखाबाद और कन्नौज की आलू बेल्ट बुरी तरह तबाह हुई. बर्बादी का यह वही वक्त था जब आलू की खुदाई का काम चल रहा था. बहुतेरे किसानों का आलू तो खेतो में ही पड़ा पड़ा सड़ गया. समूचा इलाका सड़े आलू की दुर्गन्ध से भर गया. लोग त्राहि त्राहि कर उठे. अब वह दिन दूर नहीं जब बाजार में आलू के भाव सबको रुलाते दिखेंगे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी मौसम ने किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया. उधर बनारस, फैजाबाद, गोरखपुर, लखनऊ, बाराबंकी, शाहजहांपुर, हरदोई, बरेली, पीलीभीत, रामपुर, मुरादाबाद, और प्रदेश के अन्य सभी जिले भी इस आपदा से कराहे. नुकसान कहीं  40 फ़ीसदी तो कहीं 60-70 फ़ीसदी तक अनुमानित है. दरअसल, जहां ओलावृष्टि की मार कम पड़ी और बारिश के बावजूद कुछ बाख रह गया, उन जिलों में किसानों को जो गेहूं प्राप्त हुआ, उसकी गुणवत्ता बेहद खराब है. दाने बेहद पतले हैं और उनकी चमक गायब है. कहने को तो सरकारों ने घोषणा कर रखी है कि किसानों का अन्न खरीदा जरूर जाएगा, चाहे उसकी गुणवत्ता कैसी भी हो, लेकिन देखने में यह आ रहा है कि ऐसा हो नहीं रहा है. हो सकता है कि प्रदेश के कुछ किसान इस मामले में भाग्यशाली हों, पर सब की किस्मत ऐसी नहीं. व्यापारी इस गेहूं की कीमत हजार रूपए प्रति कुंतल भी देने को राजी नहीं. खैर...
अब ज़रा उस मरहम का भी जायजा लें, जो शासन सत्ता की और से लगाने के प्रयास हुए. कुदरत के कहर के बाद बेशक केंद्र सरकार फ़ौरन हरकत में आई, वरिष्ठ मंत्रियों को प्रभावित इलाकों में रवाना किया गया. इसका कम से कम इतना तो असर हुआ ही कि हाथ पर हाथ धरे बैठी प्रदेश की नौकरशाही की नींद भी टूटी. नुकसान के आकलन की गति तेज हुई. इससे केंद्र और राज्य सरकारों के बीच एक अघोषित प्रतिस्पर्धा और राजनीति का दौर भी चला. बेशक इसमें राज्य की सरकार दबाव में आई और कुछ अपेक्षित घोषणाएं हुईं. किसानों के कर्ज की वसूली रोकी गयी. मुआवजे के नाम पर शुरू हुए मजाक का दौर भी थमा. शुरुआत में जहां अनेक किसानों को 70-80 या 100 रूपए के चेक देकर जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा कार्य हुआ, वहीं बाद में जब दबाव बढ़ा तो हालत सुधरे. केंद्र ने नुकसान को पुनर्परिभाषित करते हुए 33 फीसद तक भी नुकसान झेलने वाले किसानों मुआवजे के लाभार्थियों की श्रेणी में रखा. पहले 50 फ़ीसदी से कम नुकसान पर कोई राहत नहीं थी. अब भारी नुकसान वाले इलाकों में मुआवजे के चेक बांटे जा रहे हैं. यह भी ठीक ही हुआ कि इस आपदा के परिणामस्वरूप जान गंवाने वाले किसानों के परिजनों को ठीकठाक मुआवजा दिया गया और नुकसान के मुआवजे की रकम भी बढ़ाई गयी.
हालांकि इस मुआवजे से भी किसानों के नुकसान की भरपाई हो पाएगी, कहना मुश्किल है. वजह यह कि नुक्सान बहुत ज्यादा हुआ है और जो मुआवजा दिया जा रहा है उससे खेती की लागत भले निकल आये, किसान के पास खाने को कुछ नहीं बचेगा. एक तरह से यह किसानों के रोष और उनकी हताशा को थामने का प्रपंच भर है. जरूरत तो इस बात की है कि उन्हें खेती के लिए उपयुक्त संसाधन मुहैया कराए जाएं. सिंचाई के पुख्ता प्रबंध हों. ऐसी फसलों का विकास किया जाए जो अति वृष्टि और अनावृष्टि- दोनों का मुकाबला करने में सक्षम हों. प्रदेश में कुछ किसान जैविक खेती से अच्छा लाभ ले रहे हैं लेकिन यह उपलब्धि आज भी उँगलियों पर गिनने लायक ही है. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जैविक खेती में ऐसी आपदाओं से लड़ने की ज्यादा क्षमता होती है. सवाल है कि ऐसा भला क्यों नहीं हो सकता. विकास खण्डों में तैनात कृषि विभाग के कर्मियों को कभी गाँवों में किसानों के साथ उठते बैठते नहीं देखा जाता. प्रश्न उठता है कि इनकी तैनाती आखिर किस मकसद के लिए है. वे गाँवों में जाकर लोगों को जैविक खाद बनाने के तरीके क्यों नहीं बताते. मिट्टी की जांच की सुविधा आज भी महज कागज़ पर ज्यादा प्रभावी है. किसानों को कोई बताने वाला नहीं है कि किस मौसम में कौन सी फसल बोई जाए. फसल चक्र सरीखे सिद्धांत सिर्फ किताबों की शोभा बढ़ाते हैं.
एक बात और, उत्तर प्रदेश सरकार इस बात को लेकर अपनी पीठ ठोंकते नहीं अघा रही है कि उसने सिंचाई का बिल माफ़ कर दिया है. वास्तविकता यह है कि जब से सिंचाई माफ हुई है, नहरों में समय से पानी की उपलब्धता मुश्किल हो गयी है. किसान मारे मारे फिरते हैं और उनकी सुनने वाला कोई नहीं. न तो नहरों की समय से सफाई हो रही है, न रोस्टर के मुताबिक़ भरपूर पानी छोड़ा जा रहा है और न ही कोई यह देखने वाला है कि किसानों की वास्तविक जरूरत क्या है. दूसरी तरफ सरकार है कि कुछ सुनने को राजी नहीं, बस अपना ‘मंगल गीत’ गाए जा रही है. यह भी विडम्बना ही है कि जिस सिंचाई महकमे का समूचा तंत्र गाँवों में है उसके अफसरान शर में दफ्तर बनाकर वक्त काट रहे हैं. और तो और सिंचाए विभाग का जेई तक शहर में रहता है और किसानों से उसकी जान पहचान तक नहीं. यही हाल बिजली व्यवस्था का है. इस महकमे के अधिसंख्य अभियंता शहरों में रह रहे हैं. वे भला किसानों की जरूरत को कैसे समझेंगे.
यहाँ, बुंदेलखंड की चर्चा एक बार फिर जरूरी है. कुछ साल पहले चित्रकूट व आसपास के इलाकों में छोटी नदियों और झरनों के पानी को रोककर सिंचाई की जरूरत पूरी करने और पेयजल संकट के सामाधान की गरज से करोड़ों की लगत से चेकडैम बनाने का काम शुरू कराया गया था. इस परियोजना में धन की जितनी जबरदस्त लूट हुई, उसकी नजीर शायद ही अन्यत्र मिले. दर्जनों स्थानों पर हुए सारे के सारे निर्माण एक भी बरसात नहीं झेल सके औए इलाके के लोग ताकते ही रह गए. इस प्रकरण की शिकायतें अनेकों बार शासन तक पहुंचाई गयीं, लेकिन किसी के कान पर जून तक नहीं रेंगी. भ्रष्टाचार के ये जीते जागते नमूने आज भी देखे जा सकते हैं.
इस साल को उत्तर प्रदेश सरकार ने किसान वर्ष घोषित कर रखा है, लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिखता कि किसानों को भी लगे कि उनके लिए कुछ हो रहा है. जब अतिवृष्टि का दौर चला तो सरकार ने घोषणा की कि किसानों को जायद के बीज दिए जाएंगे ताकि वे अपने घाटे की भरपाई कर सकें. घोषणा में कोई बुराई नहीं थी, लेकिन विडम्बना यह है कि सरकार ने यह नहीं कहा कि नहरों को उनकी पूरी क्षमता से चलाया जाएगा ताकि सिंचाई अच्छे ढंग से हो सके. नतीजा- नहरें सूखी पड़ी हैं और किसान अपने हाल पर रो रहा है. जायद के अच्छे बीज तो आज भी सपना ही हैं. वैसे भी अच्छा होगा यदि सरकार किसानों को खरीफ की तैयारियों के लिए मदद करे, क्योंकि अब मानसून में ज्यादा वक्त नहीं बचा है. तैयारियां इस लिहाज से भी जरूरी हैं कि अगर मानसून कमजोर हुआ, जैसी कि आशंका जताई जा रही, तो क्या होगा.
क्यों नहीं लेते कृषि विभाग की मदद
पिछली 4 मई को उत्तरप्रदेश की आश्वासन समिति के चेयरमैन और महाराजपुर विधानसभी क्षेत्र के भाजपा विधायक जब अपने क्षेत्र के कई गाँवों में किसान पंचायतों के जरिये किसानों से रूबरू हुए तो उनके सामने एक जबरदस्त सवाल कौंधा. वह था लेखपालों की मनमानी का. लगभग हर जगह किसानों ने शिकायत की कि लेखपाल फसलों के नुकसान के सर्वे में भारी मनमानी कर रहे हैं. यह तक कहा गया कि नुकसान दर्शाने लिए पैसे मांगे जा रहे हैं. परिणाम यह हुआ है कि अपात्रों को ज्यादा और पात्रों को बेहद कम मदद मिल रही है. लेखपालों की यह मनमानी समूचे प्रदेश में चली. कहीं कम तो कहीं ज्यादा. घर बैठे बैठे ही ढेर सारी रिपोर्टें तैयार हो गयीं और उन्हीं के आधार पर मुआवजा तय हो गया. इन्हीं तौर तरीकों के खिलाफ कुछ जिलों में किसानों ने धरना प्रदर्शन भी किया.
दरअसल, यह सवाल बेहद गंभीर है. यह नीतिगत प्रश्न भी है. कई जानकर मानते हैं कि फसलों के नुकसान को जो ब्योरा कृषि विभाग तैयार कर सकता है वह लेखपाल नहीं कर सकते. लेखपाल वस्तुतः जमीन की पैमाइश के लिए होते हैं, फसल के नुकसान के आकलन की सामर्थ्य उनमे नहीं. अब इसे विडम्बना ही तो कहेंगे कि यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है और आज तक इसमें सुधार नहीं किया गया. प्रश्न यह है कि जब हर ब्लाक में एक एडीओ एग्रीकल्चर की तैनाती है तो फिर उनसे काम क्यों नहीं लिया जाता. इसका जवाब कोई देने को तैयार नहीं.

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