ये जीना भी कोई जीना है
मित्रों, कानपुर शहर का एक मोहल्ला है शास्त्रीनगर. कालपी रोड केदक्षिण की ओर है फजलगंज व ददानगर का औद्योगिक इलाका और उत्तर में है शास्त्रीनगर. यहीं पर इलाहाबाद बैंक के बगल में, जहाँ मेरा अस्थायी निवास है, कुछ खानाबदोश लीगों का बसेरा है. ये खानाबदोश दिन में नहीं दिखाई देते, लेकिन शाम होते होते इनका आगमन शुरू हो जाता है. कुछ तो चार पांच बजे ही आ जाते हैं, जबकि कुछ दिखाई पड़ते हैं दिन ढलने के बाद. घंटे- दो घंटे तक ये यूं ही वक्त जाया करते हैं और जब दुकानों के शटर गिर जाते हैं तो शुरू हो जाती हैं इनकी दैनिक क्रियाएं. बैंक के बरामदे, सड़क की पटरी और आसपास झाड़ू लगता है, फिर जल उठते हैं इनके अस्थायी चूल्हे. आपस में तरह तरह की बहस में उलझे, पकाते खाते इन खानाबदोशों को शायद पता भी नहीं चलता कि कब रात गहरा गयी और सोने का वक्त हो गया. फिर ये पड़ जाते हैं वहीं. गहरी नींद के आगोश में पहुँच जाने के बाद इनमें से बहुतों को पता भी नहीं चलता कि मच्छरों की खतरनाक फ़ौज इनका कितना खून चूस रही है. इस रातभर के बसेरे में पुरुष हैं, महिलाएं भी. जाहिर है कि उनके बच्चे भी साथ होते हैं. कुछ बुजुर्ग भी होते हैं जो मच्छरों से बचने के लिए अपनी रूमाल से ही पंखे का काम लेते रहते हैं. थक जाते हैं तो वे भी वहीं पसर जाते हैं. और हाँ, भोर होने से पहले ही ये जाग जाते हैं, फिर नित्यक्रिया से निवृत्त होने और आसपास झाड़ू मारकर गठरी पुतकी सिर पर लाड ये रुखसत हो जाते हैं यहाँ से.मैं नहीं जानता कि ये कहाँ जाते हैं, क्या करते हैं. हाँ, एक दो को रिक्शा चलते देखा है मैंने. लेकिन महिलाएं- उनके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है. एक दिन मैं दफ्तर से लौटा तो रात के दो बज रहे थे. देखा- कुछ पुरुष, महिलाएं एक बुजुर्ग से किस्से कहानियां सुनने में मगन थे. जिज्ञासावश मैं थोड़ी देर तक रुका, उनकी बोली भाषा समझने की कोशिश की. मुझे लगा कि ये मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं. पूछ ही लिया तो बुजुर्ग ने बड़ी ही विनम्रता से बताया कि वे लोग रीवा जिले की त्योंथर तहसील के एक गाँव के निवासी हैं. चर्चा चली तो बताने लगा कि दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में वे सब घरबार छोडकर तीं सौ किलोमीटर दूर इस शहर में आ गये हैं. उस बुजुर्ग ने बताया कि वह कोई बीस साल से यहीं रहता है सड़क के किनारे. अब बेटा व बहू भी यहीं आ जाते हैं. पोता है तो उसे कहां छोड़ें. जाहिर है, वह भी सड़क किनारे पल रहा है. इसी तरह कई और परिवार हैं जो यहीं सड़क किनारे गुजर कर रहे हैं. कुछ अकेले भी हैं. ये कमाधमा कर ये अपने गाँव भी जाते है, फिर आ जाते हैं. कभी कभी यहाँ इन लोगों की आबादी सौ के आसपास होती है तो कभी दस बीस ही होते हैं.
मेरे मकान मालिक ने एक दिन बताया कि ये सब भिखमंगे हैं. कुछ ही हैं जो मेहनत मजदूरी करते हैं. इक्का दुक्का नौजवान रिक्शा चला लेते हैं, बाकी किसी न किसी मंदिर के सामने बैठकर भीख मांगते हैं. मैं अवाक था यह सुनकर. कोई अशक्त हो तो उसका भीख मांगना समझ में आता है, लेकिन अच्छे भले लोग भी भीख मांगेंगे तो कैसे चलेगा यह देश. एक दिन मैंने इनमें से एक से यह पूछ ही लिया कि आखी वे अपने गाँव में रहकर खेतीबाड़ी या अन्य कार्य क्यों नहीं करते? जवाब था- मेहनत करें भी तो क्या फायदा जब पेट ही न भरे. इशारा साफ़ था कि उन्हें उनका मेहनताना नहीं मिलता गाँव में या फिर मिलता भी है तो इतना कम कि इस महंगाई के ज़माने में वह पूरा नहीं पड़ता. वैसे कहने को तो गाँवों में अब मनरेगा जैसी अति महत्वाकांक्षी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन इन खानाबदोशों की दशा देखकर लगता है कि सब कुछ ठीक नहीं है.
बहरहाल, वे अपनी इस दुनिया में खुश ही हैं. वे अपनी इस दशा केलिए किसी को दोष नहीं देते. बीएस व्यवस्था से ऊब गये तो निकल आये गाँव से. अब तो उन्हें यहाँ रोज रोटी भी नहीं पकानी पड़ती, कोई न कोई आस्थावान इन्हें कुछ न कुछ खाने को देता ही रहता है. दिनभर वे जो कमाते हैं, वह इनकी बचत ही है. हाँ, एक बात और- इतने दिन से यहाँ रहते हैं ये, लेकिन कभी राहजनी नहीं की. ये गरीब हैं, लेकिन चोर उचक्के नहीं. नीयत उनकी आज भी सही है. सवाल यह है कि क्या सत्ता के नियामकों की नीयत भी कभी सुधरेगी. क्या ये यूं ही सड़क पर बसर करते रहेंगे.
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