विकास और विकास के
दावे
अभी कुछ दिन पहले रीवा
जिले के कुछ गाँवों का दौरा करने का मौका मिला. इलाहाबाद का सीमावर्ती क्षेत्र होने
के कारण उस तरफ आना जाना तो हमेशा ही लगा रहता है, लेकिन इस बार कुछ अलग तजुर्बा लेकर
लौटा. दरअसल, पहली बार मुझे लगा कि अब मध्यप्रदेश अपने उत्तर प्रदेश को विकास के मामले
में चुनौती देने को तैयार है. मैं ऊपर की बात नहीं करूँगा. एकदम निचले स्तर पर भी लोगों
में विकास की ललक है. उन्हें नित बेहतर बनती सड़कें भा रही हैं. किसी ज़माने में जहाँ
असिंचित खेती होती थी, वहां अब पम्पिंग सेटों के सहारे जोरदार खेती हो रही है. पहले
लोग धान की अगेती फसल ही बमुश्किल पैदा कर
पाते थे, वहां अब उन्नतिशील प्रजातियाँ लहरा
रही हैं. मैंने रीवा रोड पर सोहागी गाँव में जबरदस्त बदलाव महसूस किया. इतनी अच्छी
फसल तो मेरे इलाहाबाद में भी कम ही दिखती है, जो धान का इलाका माना जाता है. इस गाँव
में पहले बारिश के दिनों में पैदल चलना मुहाल होता था, अब यहाँ सीसी रोड बन गयी है.
कोई भी मौसम हो, अब कोई दिक्कत नहीं. एक खास बात और- यहाँ बिजली के तार अब बदल गये
हैं. चोरों की शामत आ चुकी है. खम्भों पर केबल वाले तार दौड़ा दिए गये हैं. कटिया कनेक्शन
की कोई गुंजाइश नहीं. वैध उपभोक्ता खुश हैं. सही भी है. भाई, बिजली लेनी है तो पैसे
खर्च करिए. पैसा आएगा तो महकमा दुरुस्त रहेगा और उपभोक्ता भी परेशान नहीं होंगे. पम्पिंग
सेट्स के लिए अलग फीडर का इंतजाम हो गया है. कहीं कोई किचकिच नहीं. हाँ, बिजली की किल्लत
है, लेकिन इसमें भी सुधार दिख रहा है. एक खास बात और- अब यहाँ टोंस नदी से लिफ्ट कैनाल
निकाली जा रही है. लोगों ने मुझे बताया कि यह काम भी अगले साल पूरा हो जाएगा. फिर क्या.
मौज ही मौज है. खेतीबाड़ी दुरुस्त हो तो गाँव के युवक चार छह हजार की चाकरी के लिए
मुम्बई और दिल्ली की धूल क्यों फांकें. सडक, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं
की गारंटी हो जाए तो गाँव के लोगों को और क्या चाहिए. मुझे वहां की सरकार से कुछ भी
लेनादेना नहीं, लेकिन यह बात मैं निस्संकोच कहूँगा कि मध्यप्रदेश में विकास होता दिख
रहा है. लोग खुश भी लगते हैं. एक वरिष्ठ और बुजुर्ग कांग्रेसी नेता से चर्चा चली तो
उन्होंने साफ़ कहा, यहाँ जो काम कई दशक में कांग्रेस की सरकारें नहीं कर पायीं, उन्हें
मौजूदा शासन बड़ी ख़ामोशी और तत्परता के साथ कर रहा है. जो अच्छा काम करेगा, वही राज
करेगा.
अब जरा अपने यूपी की
बात करें. जातियों के खांचों में बंट चुका अपना समाज क्या सोच रहा है, यह तो वही जाने,
मुझे तो बस इतना कहना है कि आसार अच्छे नहीं दिख रहे. पिछले कई वर्षों से इस सूबे की
सरकारें जिस तरह के विकास में दिलचस्पी लेती रही हैं, वह किसी से छिपा नहीं है. गरीबों
की हालत पर घड़ियाली आंसू बहाने वालों के महल तो खड़े हो गये पर गरीब का आज भी कोई पुरसाहाल
नहीं. रीवा में तो अब नहरें बन रही हैं, अपने यहाँ तो नहरों का मुकम्मल जाल कई दशकों
से बिछा है. लेकिन अफ़सोस- ये नहरें किसानों का उतना ही भला कर पायी हैं जितने में रो-गाकर
उनका पेट भर जाए. नहरों से सम्बंधित नौकरशाह शहर में बैठकर मौज कर रहे हैं और किसान
मरा जा रहा है. और अब तो मौजूदा सरकार ने सिंचाई की सुविधा भी मुफ्त कर दी है. नतीजा
यह हुआ है कि नहरों की सफाई का कोई ठिकाना नहीं रह गया है. मैंने अपने गाँव में देखा
है, लोग छोटे छोटे डीजल इंजन खरीद कर नहरों से पानी खींच रहे हैं. कुलाबे चूँकि पास
नहीं हो रहे, इसलिए किसान हताश हैं. डीजल पर खर्च बढ़ा तो जाहिर है कि खेती से जो फायदा
होता वह दूसरी तरफ से निकल जाएगा. किसान के पास बचेगा क्या, यह बड़ा सवाल है. कौन देगा
इसका जवाब. शहरों की बात छोड़ दें तो गाँवों का हाल बुरा है अपने यहाँ. बिजली का कोई
ठिकाना नहीं. कब आएगी कब जायेगी. न सड़कें दुरुस्त हैं न नहरें सही ढंग से चल रही हैं.
फिर कैसे कह सकते हैं कि अपना सूबा भी विकास कार रहा है. नए संसाधनों की तो बात ही
छोडिये, जो उपलब्ध भी है उसका समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है. कैसे कहें कि हम विकास
कर रहे हैं. मुझे मुफ्तखोरी से बड़ी चिढ़ है, लेकिन अपने सूबे की हुकूमत महज मुफ्तखोरी
के सहारे राजपाट चलाना चाहती है. कैसे चलेगा यह सब और कब तक चलेगा. कोई तो बताये कि
मुफ्तखोरी से कैसे व्यवस्था सुधरेगी.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें