मेरा गाँव बड़ा प्यारा!
मुझे याद है कि बचपन में स्कूल आते जाते वक्त जब कभी नहर की पटरी से कोई
दोपहिया वाहन गुजरता था तो उससे निकलने वाले धुएं की गंध देर तक महसूस होती थी. आज
भी करीब करीब वैसा ही है. वजह- गाँव आज भी प्रदूषण से काफी कुछ बचे हुए है. पहले
जैसी बात तो नहीं है, लेकिन फिर भी काफी राहत है. यहाँ मैं गाँव की उस इकाई की बात
कर रहा हूँ, जिसके इर्दगिर्द चार छह किलोमीटर तक धुआं उगलने वाले औद्योगिक संयंत्र
नहीं हैं. यहाँ हल्की सी गंध का भी एहसास होता है. वातावरण में कुछ आया नहीं कि
उसका एहसास होने में देर नहीं लगती. फिर ग्रेजुएशन करने के लिए शुरू हुआ शहर का
सफर. मुझे शुरू में वाहनों का धुआं परेशान करता था, लेकिन धीरे धीरे इसका एहसास कम
होता गया. हाँ, जब गाँव जाकर फिर शहर लौटता था तो कुछ देर तक परेशानी होती थी.
धीरे धीरे यह धुआं शरीर तंत्र में ऐसा घुसा कि अब कुछ पता ही नहीं चलता.
नौकरी के दौरान इलाहाबाद के बाद लखनऊ और फिर कानपुर से गहरा साक्षात्कार हुआ.
गाँव की निर्मलता के विपरीत यहाँ मुझे तीन चीजें दिखीं- धुआं, धूल और शोर. करीब
करीब सभी शहरों का यही हाल है. इस शहरी जीवन की मुसीबतें और भी हैं, मसलन आवारा
कुत्ते, छुट्टा विचरते जानवर, बेहद खतरनाक हो चला यातायात आदि आदि. इन सब में
धुआं, धूल और शोर ने तो स्थायी बीमारी का स्वरुप अख्तियार कर लिया है. इनके समाधान
की आज भी कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है. आगे भी कोई उम्मीद नहीं दिखती. इधर, आवारा
कुत्तों, साड़ों और सुअरों के आतंक ने भी शहरी जीवन को बेहाल कर दिया है. ये सांड
कब किसका पेट चीर डालें, कहना मुश्किल है. कब कोई सुअर अचानक आपके दोपहिया वाहन के
सामने आ जाये और आप वाहन समेत किसी नाली में जा समाएं, आपका हाथ पाँव टूट जाए,
क्या पता. कब कोई कुत्ता आपको काट खाए और आप अस्पताल के चक्कर काटते फिरें, कुछ
कहा नहीं जा सकता. और तो और, शहर का जनजीवन निहायत बेहूदा हो चले ट्रैफिक से भी रो
रहा है. सड़क हादसों की ख़बरें अखबारों में छाई रहती हैं. आये दिन लोगों की जान जा
रही है. प्रशासन के लोग यातायात माह और यातायात सप्ताह जैसे कर्मकांड करके कुछ
पैम्पलेट्स वगैरह बाँट कर सन्देश देते हैं कि भैया धीरे चलो, सुरक्षित चलो, लेकिन
साहब, कहाँ फर्क पड़ता है, किसे फर्क पड़ता है. सबको जल्दी है. किसी के पास इतना
समय कहाँ कि अपने अलावा दूसरों की भी फ़िक्र करे. तो क्या शहरी जीवन ऐसा ही रहने
वाला है. मुझे तो ऐसा ही लगता है क्योंकि व्यवस्था के नियामकों के पास ऐसी
समस्याओं से निजात दिलाने की कोई कारगर रणनीति नहीं दिखती.
मुझे याद है कि छात्र जीवन में कुछ शहरी सहपाठी हंसी मजाक के दौरान मुझे
देहाती कहकर दुत्कारते थे. मैं झेंप जाता था. अपने देहाती होने पर शर्म सी आती थी.
तब गाँव के मुकाबले शहर का बड़ा क्रेज था. जो शहर में रहता था, उसे लोग बड़ा आदमी
मानते थे. उनका बड़ा स्वागत सत्कार होता था. तब गाँव में कुछ था भी नहीं. न सड़कें
न अस्पताल, न बिजली, न फोन. टेलीविजन भी शुरू शुरू में इक्कादुक्का लोगों के घरों
की शान बढ़ाता था. रामायण और महाभारत देखने के लिए एक ही जगह पर समूचा गाँव इकठ्ठा
होता था. क्या दिन थे. लेकिन अब वहां बहुत कुछ है. सड़कें है, अस्पताल भी है,
डिग्री कालेज हैं, बिजली है, मोबाइल फोन हैं और टेलीविजन भी. अब तो अनेक घरों में
डीटीएच के एंटीना भी खूब दिखते हैं. ज्यादातर लोगों के मकान पक्के हो चले हैं. घर
के बाहर हरियाली भी है जहाँ चिड़ियों का कलरव गान भाता है. सरसों के फूल, गेहूं की
बालियाँ, असिंचित इलाकों में ज्वार बाजरे और अरहर की फसल कम सुकून थोड़े ही देती
है.
बहरहाल, एक दिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मेरे एक शहरी सहपाठी मिल गये. शहर
के एक बड़े बाजार में उनका काफी बड़ा कारोबार है. पढाई छोड़ने के बाद से ही कारोबार
में जुट गये थे. मैंने महसूस किया कि वे कुछ कुछ चिल्लाने जैसे अंदाज में बोलते
है. धीमे बोलिए तो उन्हें समझने में दिक्कत होती है. बेशक वे करोड़ों के मालिक हो
चुके हैं, वातानुकूलित मकान में रहते हैं, लेकिन सुख चैन कहीं खो गया लगता है.
मुझसे कहने लगे, कहीं थोड़ी सी जमीन दिलवाइये, फार्महाउस खोलना है. फिर खुद ही कबूल
किया कि वे इस जीवन से आजिज आ चुके हैं. पैसा बहुत हो गया, लेकिन सुकून कहीं खो
गया है. दिन रात दौड़ने वाले वाहनों का शोर उनकी श्रवण शक्ति लगभग छीन चुका है.
मैंने मजाक में ही कह दिया, शहरी कहीं के, अब जाना कि गाँव क्या होता है. अब
झेंपने की बारी उनकी थी. खैर...
दरअसल, रोजी रोजगार के चक्कर में शहरों की ओर जो पलायन हुआ, उससे शहरों की
माली हालत चौपट होती गयी और अब तो शहर नाम की इकाई का कोई पुरसाहाल नहीं. उधड़ी
सड़कें, बेहद प्रदूषित पेयजल, आधी अधूरी बिजली, खतरनाक प्रदूषण और अन्य बुनियादी
समस्याओं का मकड़जाल हर किसी को हलकान कर रहा है. मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि कोई
भी शहर अब रहने लायक नहीं है, लेकिन सच यह है कि ज्यादातर शहरों के सामने यही संकट
है. जरूरत है इससे उबरने की लेकिन यह बड़ा सवाल है कि कैसे होगा यह सब? कब तक यूं
ही चलेगा?
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