उफ़ ये सफर!
प्रकाश पर्व दीपावली
चित्रकूट के लिए कुछ अलग ही महत्व रखता है. इस दिन मन्दाकिनी में पवित्र स्नान और कामतानाथ
के दर्शन कर भक्त धन्य हो उठते हैं. यही वजह है कि दीपावली पर यहाँ तिल रखने की भी
जगह नहीं रह जाती. बुंदेलखंड और उसके आसपास के जनपदों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु
कामतानाथ के दर्शन करने पहुँचते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करते
हैं. यहाँ पहुँचने के लिए लोग निजी वाहनों के साथ ही सार्वजनिक वाहनों पर लदे चले आते
हैं. कई बार यह आपाधापी श्रद्धालुओं को मुसीबत में डालती है, लेकिन यह आस्था ही है
कि किसी को इसकी परवाह नहीं रहती. सोमवार को चित्रकूट जा रही एक ट्रेन को देखकर भी
यही लगा. ठसाठस भरी इस ट्रेन की छत पर भी बड़ी संख्या में लोग सवार थे. संयोग ठीक था कि
कोई हादसा नहीं हुआ, वर्ना इसकी पूरी आशंका थी. विडम्बना देखें कि रेलवे के किसी अधिकारी
ने ट्रेन की छत पर बैठे यात्रियों को नीचे उतारने की जहमत नहीं उठायी. सब तमाशबीन बने
रहे. क्या मजाक है साहब. सवाल यह है कि अगर यात्रियों की संख्या ज्यादा है तो और ट्रेनें
क्यों नहीं चलाई जा सकती थीं. या रोडवेज की और ज्यादा बसों को क्यों नहीं लगाया जा
सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ऐसा कभी नहीं होता. शायद भविष्य में भी कोई उम्मीद नहीं.
तो क्या यह मानकर चला जाए कि सरकारी तंत्र को अभी हादसों का इंतजार है. अब तक ट्रेनों
की छतों पर यात्रा करने से जितने हादसे हो चुके हैं, क्या वे कम हैं. आखिर आदमी को
कब तक भीड़ समझा जाता रहेगा.

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