शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012


अपना अपना भाग्य
तारीख थी २४ नवम्बर, २०१२ और शहर कानपुर. उस दिन के दो घटनाक्रम बरबस याद आते हैं. यूं, इसमें नया कुछ नहीं था, लेकिन घटनाक्रम एक ही दिन का होने के कारण वह भुलाए नहीं भूलता. एक थी डॉग प्रदर्शनी और दूसरा था गदहा सम्मेलन. कानपुर के पालिका स्टेडियम में आयोजित डॉग प्रदर्शनी में भांति भांति के डॉगी. कृपया उन्हें कुत्ता न कहिये, क्योंकि वे ऐरे गैरे प्राणी नहीं थे. किसी की कीमत १० लाख बताई गयी तो किसी की ४० लाख. अपने मुल्क में तो एक आदमी की जिन्दगी भर की कीमत लाख रुपये तक नहीं पहुँच पाती. शाम को जब खबर तैयार होने लगी तो रिपोर्टर ने डॉग या डॉगी शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा किया था, कुत्ता शब्द का प्रयोग एकाध जगह भूलकर शायद. मैंने पूछा तो जवाब आया, ‘क्या सर ! अपनी औकात देखकर लिखी है खबर. मुझे उन्हें कुत्ता कहते शर्म आती है.’ मैं अवाक. शायद ठीक ही तो कहा था उसने. हम नौकरी पेशा लोग अच्छी खासी तनख्वाह पाकर भी जिंदगी में ४० लाख का मुंह नहीं देख पाते और यहाँ तो एक डॉगी की ही कीमत इतनी है. जाहिर है कि इनकी खुराक भी कोई ऐसी वैसी नहीं होगी. इन्हें सब कुछ उपलब्ध है, यहाँ तक कि इन्हें नहलाने धुलाने और हवा खिलाने वाले नौकर चाकर भी. गरीबी रेखा के नीचे बसर कर रही करोड़ों की आबादी को यह सब कहाँ मयस्सर है. इनकी शान के आगे खुद को देखकर सचमुच शर्म आती है. आदमी तो आदमी, कुत्ते भी हमसे बेहतर जिंदगी जी रहे हैं. अपना अपना भाग्य है भैया.
और हाँ, उसी दिन कानपुर के ही लाजपत भवन सभागार में आयोजित हो रहा था गदहा सम्मेलन, जिसमें गधे की चीपों चीपों सुनने के लिए शहर के पढ़ेलिखे लोग व्याकुल हो रहे थे. रंग भारती के इस आयोजन का पास जिसे मिला, वह अपने को धन्य समझ रहा था. खैर, इस सम्मलेन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, उनके कुछ मंत्रिमंडलीय सहयोगियों, भाजपा के अगुवा नितिन गडकरी, नारायण दत्त तिवारी, महापौर जगतवीर सिंह द्रोण समेत जाने कितनी अन्य महा विभूतियों को गदहा रत्न घोषित किया गया. ठहाकों के बीच इस ‘मूर्खिस्तान’ ने देर रात तक लोगों को बांधे भी रखा, लेकिन घर लौटकर सभी को यह जरुर लगा होगा कि वे खली हाथ ही हैं. गधों की चीपों चीपों के बीच आप कुछ देर तक जरुर अपने हालात से मुंह मोड़ सकते हैं, लेकिन यह खुशफहमी ज्यादा देर तक भला कैसे टिक सकती है. भोर होते ही कूड़ा बीनने के लिए निकलने वाली महिलाएं, हाथों में कटोरा लेकर भीख मांगते बच्चे, खांसते हुए रिक्शा खींचते मजदूर, बंद पड़े कारखानों के सामने उन्हें चालु करने की मांग को लेकर धरने पर बैठे श्रमिक, खेतों में खटते मेहनतकश- क्या इनके लिए भी कोई अवसर है इस समाज में?  यह तबका तो शायद यही कहेगा- व्यवस्था के नियामकों के लिए और कौन सा सम्मान भला बेहतर है.

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