मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

ऐसी दरियादिली किस काम की
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक कार्यक्रम में शिकायत की कि दिल्ली में पानी की आपूर्ति में रियायत की बड़ी चर्चा हुई लेकिन उन्होंने अपने प्रदेश में किसानों को सिंचाई की मुफ्त व्यवस्था कर दी, फिरभी मीडिया ने इस पर ध्यान नहीं दिया. यह शिकायत सही हो सकती है क्योंकि मीडिया तो केंद्र और राज्यों की राजधानियों से उबर ही नहीं पा रहा है. दिल्ली की एक से बढ़कर एक फूहड़ ख़बरें परोसने में मीडिया तनिक भी कोताही नहीं बरतता. हर रोज ‘पंचायतें’ बैठती हैं, आरोप प्रत्यारोप चलते हैं, कुछ ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो राजनीति से इतर देश में कुछ है ही नहीं. सही है कि विकास की तमाम महत्वपूर्ण ख़बरें आधुनिक मीडिया की नजरों से ओझल हैं या यूं भी कह लें कि मीडिया को इसमें दिलचस्पी नहीं. ऐसे में मुख्यमंत्री की शिकायत वाजिब ही है, इससे भला कैसे इनकार किया जा सकता है.
राजनीति, फिल्म, फैशन, क्रिकेट और अपराध- इन पांच विषयों को छोड़ दें तो आधुनिक मीडिया के पास ज्यादा कुछ बताने को है नहीं. ज्यादा हुआ तो शहरीकरण से जुडी कुछ विसंगतियों पर चर्चा हो जाएगी या फिर कुछ ख़ास घटनाक्रमों की. ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े मुद्दों, समस्याओं, संभावनाओं आदि को अपेक्षित कवरेज तो नहीं ही मिल रहा है और भविष्य में भी दूर दूर तक इसकी संभावना नहीं दिखती. हां, प्रिंट मीडिया जरूर अपवाद है जहां ग्रामीण समस्याओं और अन्य मुद्दों से जुडी ख़बरों को जगह आज भी मिलती है. यह इसलिए भी क्योंकि अखबारों का प्रसार गाँव देहात में भी है. आप कह सकते हैं कि टेलीविजन भी तो गाँवों में पहुँच रहा है. गाँवों में प्राइवेट टीवी चैनलों को रिसीव करने वाली छतरियां बड़ी संख्या में दिखने लगी हैं. लेकिन इससे चैनलों के राजस्व में भला कहाँ इजाफा होता है. दरअसल, सवाल आमदनी और खर्च का तो है ही. अपना मीडिया अभी मूलतः शहरी है और देश की बहुसंख्यक आबादी बसती है गाँवों में. गाँवों से सम्बंधित कवरेज से शहरी मीडिया को भला क्या लाभ मिलेगा. हां, सब्जियां या खाद्यान्न महंगे हो जाएं तो मीडिया जरूर रोएगा. किसान की फसल चौपट हो जाए तो मीडिया के लिए यह अदना सी खबर है. यानी मीडिया की सोच शहरी है, उसकी आय का मुख्य स्रोत भी शहर ही हैं. फिर भला वह गांवों को लेकर ज्यादा माथापच्ची क्यों करे. खैर...
यहाँ एक बात और- दरअसल अपने मुख्यमंत्री जी जिन कार्यों को ऐतिहासिक बता रहे हैं, वे तकनीकी रूप से या कागजी रूप में वैसे हो सकते हैं, लेकिन इससे इतर भी एक कड़वा सच है. आप सिंचाई का पैसा नहीं लेंगे, यह एक बात है और सिंचाई के लिए किसानों को समय पर पर्याप्त पानी मिले यह दूसरी बात है. मैंने देखा है कि सरकार की घोषणा के बार नहरें, जो पहले भी करीब करीब लावारिस थीं, सफाई और अन्य इंतजामों के अभाव में दम तोड़ रही हैं. पानी आ नहीं रहा है, या आ रहा है तो वह पर्याप्त नहीं है. जब जरूरत हो तो नहें सूखी ही रहेंगी. कोई देखने वाला नहीं. नहरों के संचालन के लिए अभियंताओं का एक बड़ा तबका शहरों में रहकर वेतन ले रहा है और नहरों की हालत बदतर हुई जा रही है. यह तो भला हो कि बारिश ने खरीफ को संजीवनी दी और हालिया बारिश ने गेहूं की फसल को बचाए रखा है, वरना महकमे की पोल कब की खुल गयी होती. ऐसे में यह डींग हांकना कि किसानों के हित में मुफ्तखोरी का यह फैसला ऐतिहासिक है, गले नहीं उतरता. अरे साहब, आप ऐसा क्यों नहीं कर सकते कि नहरों और नलकूपों की व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त रखिये, समय से पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करिए. सिंचाई विभाग के हुक्मरानों को शहर से भगाइए, गाँवों में भेजिए. जितना वेतन लेते हैं कम से कम उतना तो काम करें ये सब. भरपूर पैदावार हो तो किसान सिंचाई का पैसा देने में भला क्यों हिचकेगा. ऐसा हो तब आपका फैसला ऐतिहासिक कहा जाएगा.

अभी हाल में सरकारी अस्पतालों की सेवाओं के सम्बन्ध में भी कुछ घोषणाएँ हुईं. एक्सरे फ्री कर दिया गया. कुछ और सेवाएं भी फ्री करने की तैयारी है, लेकिन इससे क्या होगा. इसका महत्व तो तब है जब इन अस्पतालों का इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत हो. भरपूर दवाएं उपलब्ध हों, अन्य साजोसामान पचुर मात्र में उपलब्ध हो. वरना होगा यह कि प्रभावशाली तबका, जो पहले से ही इनका लाभ उठाता आया है, आगे भी सारा फायदा ले जाएगा और गरीब ताकते रह जाएंगे. यह सिलसिला वर्षों से चल रहा है, आगे भी चलता रहेगा. फिर ऐसी दरियादिली किस काम की.

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