मेरी हिमाचल
यात्रा (1)
14 से 21 जुलाई के
बीच हिमाचल और उत्तराखंड के कुछ महत्वपूर्ण स्थलों के दीदार का अवसर सुलभ हुआ. मैं
हिमाचल के ऊना शहर में रुका और अपने परम श्रद्धेय मित्र व भ्राता श्री जनार्दन
पाण्डेय जी शास्त्री के साथ एक आश्रम में रुका. प्रकृति की गोद में स्थित भगवान् शिव की यह स्थली बरबस ही लोगों का ध्यान आकृष्ट
करती है. मन्दिर परिसर में विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियाँ, सुबह शाम
पूजा आरती की सुमधुर ध्वनियाँ सुकून देती हैं. मंदिर परिसर के बाहर भगवान् शिव की
विशाल प्रतिमा दर्शनीय है. श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. दिन भर चलने वाले
लंगर में लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं. यहाँ के पुजारी जी की सरलता और सहजता ने बहुत
प्रभावित किया. उनका आशीष मिला, यह सौभाग्य की बात है. मैंने परिवार संग यहाँ दो दिन और तीन
रातें गुजारीं और हर वक्त वे हम सबका हाल चाल लेते रहे. शास्त्री जी की उपस्थिति
के चलते क्षेत्र को समझने में बड़ी आसानी हुई. पहले दिन
हमने विशालकाय पर्वत श्रृंखलाओं के बीच से गुजरने वाले रास्ते से होते हुए अति
प्राचीन चिंतपूर्णी देवी मंदिर में दर्शन किये. यहाँ जगह तो संकरी ही है लेकिन
साफ़ सफाई की बेहतर व्यवस्था ने बड़ा प्रभावित किया. मान्यता है कि देवी का दर्शन पूजन मनुष्य की समस्त चिंताओं का निवारण
करता है. वहां से लौटे तो अगला पड़ाव था माँ ज्वालामुखी का भव्य पवित्र स्थान. ऊंचे
पर्वतों की गोद में आबाद मंदिर की व्यवस्था भी अद्भुत है. हजारों की संख्या में
अनवरत पहुँचने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए उम्दा प्रबंध हैं. मेरे आदरणीय
भ्राता पंडित जनार्दन शास्त्री जी ने इस स्थल की महत्ता और पौराणिकता के बारे में
जानकारियाँ दीं. बारिश के मौसम में पर्वतों पर लहराते वृक्षों और ठंडी हवा के
झोंकों के बीच माँ ज्वाला का दर्शनलाभ बेहद सुकूनदायक रहा.
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