कुम्भ यानि कलश. ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिह्न है. कुम्भ का पर्याय पवित्र कलश से होता है। इस कलश का हिन्दू सभ्यता में विशेष महत्व है। कलश के मुख को भगवान विष्णु, गर्दन को रूद्र, आधार को ब्रह्मा, बीच के भाग को समस्त देवियों और अंदर के जल को संपूर्ण सागर का प्रतीक माना जाता है। यह चारों वेदों का संगम है। इस तरह इस आयोजन
को कुम्भ का नाम देना पूर्णतः औचित्यपूर्ण है। सनातन हिन्दू धर्मावलम्बियों का संभवतः यह सबसे बड़ा
आयोजन है जो देश के चार स्थानों पर पवित्र नदियों के किनारे अस्तित्व ग्रहण करता है.
हरिद्वार में गंगा, उज्जैन में क्षिप्रा, नासिक में गोदावरी और प्रयाग (इलाहाबाद) में
पवित्र गंगा, यमुना और सरस्वती के पावन तट इस भव्य आयोजन के गवाह बनते हैं. अबकी बार
यानि सन २०१३ में फिर प्रयाग की बारी है. कहा गया है- माघ मकरगत रवि जब होई, तीरथ पतिहि
आउ सब कोई. यानि माघ के महीने में जब सूर्य मकरगत हो जाता है, अर्थात मकर राशि में
प्रवेश कर जाता है तब त्रिवेणी संगम के दर्शन मात्र के लिए देवता भी लालायित हो उठते
हैं. अबकी बार कुम्भ का आयोजन १४ जनवरी मकर संक्रांति के दिन से शुरू हो रहा है. हालांकि
इसका समूचा वैभव पौष पूर्णिमा के दिन से दिखेगा. एक माह तक श्रद्धालु यहाँ स्नान, दान,
ध्यान का पुण्य लाभ अर्जित करेंगे. वैसे इसका समापन महाशिवरात्रि के दिन होता है. प्रयाग का कुम्भ मेला सभी मेलों में सर्वाधिक
महत्व रखता है. यह कुम्भ अन्य कुम्भों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह
प्रकाश की ओर ले जाता है । यह ऐसा स्थान है जहाँ बुद्धिमत्ता का प्रतीक सूर्य का
उदय होता है। इस स्थान को ब्रह्माण्ड का उद्गम और पृथ्वी का केंद्र माना जाता है।
ऐसी मान्यता है कि ब्रह्माण्ड की रचना से पहले ब्रम्हा जी ने यही अश्वमेध यज्ञ किया था। दशाश्वमेध घाट और ब्रह्मेश्वर मंदिर
इस यज्ञ के प्रतीक स्वरुप अभी भी यहाँ मौजूद है। इस यज्ञ के कारण भी कुम्भ का
विशेष महत्व है। कुम्भ और प्रयाग एक दूसरे के पर्यायवाची है। वास्तव में
कुम्भ हमारी सभ्यता का संगम है। यह आत्म जाग्रति का प्रतीक है। यह मानवता का अनंत
प्रवाह है। यह प्रकृति और मानवता का संगम है। कुम्भ ऊर्जा का स्त्रोत है। कुम्भ
मानव-जाति को पाप, पुण्य और
प्रकाश, अंधकार का एहसास कराता है। नदी जीवन रूपी जल के अनंत
प्रवाह को दर्शाती है। मानव शरीर पञ्चतत्वों से निर्मित है यह तत्व हैं-अग्नि,
वायु, जल, प्रथ्वी और
आकाश। हिमालय को देवों का निवास स्थान माना जाता है। गंगा का उद्गम हिमालय से ही
हुआ है। गंगा जंगलों, पर्वतों, और समतल
मैदानों से होते हुए अंतत: सागर में मिल जाती है। यमुना भी पवित्र मानी जाती है।
यमुना को त्रिपथगा, शिवपुरी आदि नामों से भी जाना जाता है।
गंगा ने सूर्यवंशी राजा सागर के पुत्रों को श्राप से मुक्त किया था। गंगा के जल को
अमृत माना जाता है। ऐसा सुयोग रोज रोज नहीं
मिलता. आप भी आयें और इस पवित्र आयोजन के भागीदार बनें.

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