मेरी हरिद्वार
यात्रा
हिमाचल के ऊना शहर से मैं 17 जुलाई की भोर में
जनशताब्दी एक्सप्रेस से हरिद्वार के लिए चला. पंडित जनार्दन पाण्डेय जी शास्त्री
ने हमें भावभीनी विदाई दी. अम्बाला के रास्ते से दोपहर बाद करीब ढाई बजे हरिद्वार
पहुँच गया. यात्रा की थकान थी ही, सो पहला आधा और
दूसरा दिन आराम में बीता
. बेटा और बहु भी साथ ही लौटे थे. अपनी पोती आकृति
, जो गत 15 जुलाई को ही
चार साल की हुई है और उसी की वजह से ही हमने यात्रा का प्रोग्राम बनाया, के साथ बहुत
अच्छा समय गुजरा. 18 जुलाई की शाम हमने कनखल स्थित दक्षेश्वर
महादेव के दर्शन किये. माँ दुर्गा मंदिर में
भी हाजिरी लगाईं. अगले दिन हम ऋषिकेश की राह पर थे. लक्ष्य था नीलकंठ महादेव मंदिर.
हमने हाइवे के बजाय माँ चंडी देवी मंदिर के बगल से गुजरने वाले रास्ते को चुना. यह
मार्ग गंगा के किनारे किनारे ऋषिकेश की ओर जाता है. यहीं से एक सड़क नीलकंठ की ओर
मुडती है. दूरी यही कोई 32 किलोमीटर होगी. गंगा की तेज धाराओं, गंगा के
प्रबंधन, दोनों किनारों के पक्के किनारों और उस पर बनी लघु जल विद्युत्
परियोजना ने संसाधनों के इस्तेमाल की दिशा में किये गये प्रयासों ने प्रभावित किया.
प्रकृति की गोदी में मौजूद यह समूचा परिदृश्य देखकर हम अभिभूत थे. हमारे आगे थे
ऊंचे पर्वत शिखर जिनसे टकराने पर आमादा थे बादल. रह रह कर वे बरस जाते थे. नीलकंठ
की ओर आगे बढने पर हमे दो स्थानों पर रास्ता बंद होने की समस्या से रूबरू होना
पड़ा. एक जगह तो जल्दी ही बुलडोजर ने राट्स साफ़ कर दिया, लेकिन जब
मंदिर महज डेढ़ किलोमीटर दूर रह गया था, रास्ता पर एक बड़ी
चट्टान गिरी. हमने अपनी गाडी वहीँ छोड़ी और चट्टान को पार कर, आगे से
टैक्सी का सहारा लिया और सकुशल पहुँच गये. भीड़ ज्यादा न थी. हमने बहुत आसानी और
सुकून के साथ महादेव के दर्शन पूजन किये. कितना सुंदर दृश्य है, शब्दों में
बांधना नामुमकिन है. मंदिर के थी नीचे से बहने वाले दो झरनों में लोग स्नान का
आनंद लेते दिखे. खैर, हम वहां कुछ वक्त गुजरने के बाद अपनी गाडी
की ओर रुख किया. यहाँ पर्वतों की गोद में बसी आबादी की कठिनाइयों का सहज ही एहसास
हुआ. लोग कैसे गुजर बसर करते होंगे, अनुमान ही लगा सकता
हूँ. इन मकानों पर आये दिन चट्टानें गिरने की घटनाएं होती रहती हैं. यहाँ के लोगों
ने अपने घरों से नीचे कोई ढाई तीन सौ मीटर नीचे घाटी में सीढ़ीदार खेत बनाये हैं, कुछ अन्न
पैदा कर लेते हैं.
ऋषिकेश से यहाँ के बीच पहाड़ों और जंगल का घनघोर संजाल है. मंद
मंद होती बारिश के बीच गुजरते समय मैं समझ सका कि पहाड़ की जिन्दगी की क्या हकीकत
है. वापसी में ऋषिकेश की ओर हरहराती गंगा को नमन किया. उत्तराखंड की तबाही के बाद
ऋषिकेश भी उदास है. वहां निकलने वाला बदरीनाथ हाइवे भी उदास है और उधार सन्नाटा
पसरा है. ऋषिकेश में हमे भरी बारिश का सामना करना पड़ा, फिरभी हम
आगे बढ़ते रहे. उद्देश्य पूरा हुआ. अगले दिन हम हर की पैड़ी में माँ गंगा को नमन
करते हुए ढेर सारी यादें लिए इलाहाबाद वापसी के लिए ट्रेन में सवार हो गये.
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| हरिद्वार से ऋषिकेश जाने वाली सड़क और बगम से बहतीं गंगा. उम्दा प्रबंधन. |
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| पर्वतों से टकराने पर आमादा बादल. |
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| गंगा का प्रबंधन. |
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| ऋषिकेश |
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| ऋषिकेश में हरहरातीं गंगा. |
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| नीलकंठ महादेव मंदिर जाने वाला दुर्गम मार्ग. |
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| पहाड़ की बस्ती. हमेशा खतरे में जीवन. |
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| नीलकंठ मंदिर. |
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| नीलकंठ मंदिर. |
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| नीलकंठ मंदिर. |
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| नीलकंठ मंदिर के नीचे बहता झरना. |
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| हर की पैडी |
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| इलाहाबाद वापसी के समय हर की पैडी के पास पुल गंगा का फोटो. |
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